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हिमालयी क्षेत्र में विकास की बयार, तबाही की दास्तां लिखने को तैयार

वैश्विक स्तर पर बढ़ते तापमान और प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण हिमालयी क्षेत्र में विकास की यह बयार भविष्य में एक बहुत बड़ी तबाही की दास्तां लिखने को तैयार होती नजर आ रही है। नेपाल में हुआ जल तांडव इसी का परिणाम माना जा रहा है।

नेपाल में हुई दिल दहला देने वाली घटना ने हिमाचल सहित देश के दस राज्यों की सरकारों और भारत, चीन (तिब्बत), पाकिस्तान, भूटान तथा नेपाल की सरकारों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। गौर रहे कि गर्म होती इस दुनिया में ग्लेशियर झीलों का फटना तय माना जा रहा है ।

भूगोल विशेषज्ञों द्वारा किए गए शोध कार्यों से भी मालूम पड़ता है कि हिमाचल के लाहुल-स्पीति में दो और तिब्बत में 25 के करीब ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ग्लेशियर तेजी से पिघलने से हिमाचल में 67 ऐसी झीलें हैं, जो भविष्य में खतरनाक हो सकती हैं।

यूनाइटेड नेशन ऑफिस फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन जिनेवा स्विट्जरलैंड की रिपोर्ट के मुताबिक ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी बढ़ गई है, जिसके परिणाम स्वरूप 20 सालों में 300 गीगाटन बर्फ अब तक हम खो चुके हैं। यही रफ्तार रही, तो 75 सालों में 50 फीसदी ग्लेशियरों के वजूद मिटने की भी भविष्यवाणी की गई है।

ग्लेशियर झील

ग्लेशियर जमीनी स्तर से पिघलना शुरू होता है, पिघलने की रफ्तार बढऩे पर अंदर से खोखला होकर कटोरा नुमा बन जाता है कठोर भूमि नरम हो जाती है। जमीन मलबे में तबदील होकर बाहर निकलने वाले पानी को रोक देता है, तो ग्लेशियर के अंदर झील बन जाती है। तेजी से पिघलते ग्लेशियर में दरारें पडऩे पर जब बर्फ का बड़ा टुकड़ा झील में गिर जाता है, तो पूरी फोर्स से ग्लेशियर झील फट जाती है तब बाढ़ कदम कदम पर तबाही के निशान छोड़ती है।

बासुकी-घेपन झील का सर्वे

सुरजीत राठौर

एडीएम कुल्लू डा. सुरजीत सिंह राठौर ने बताया कि आपदा की स्थिति में अलर्ट के लिए सर्वे किए जा रहे हैं। बासुकी झील और लाहुल-स्पीति की घेपन झील का भी सर्वे कर रहे हैं । पानी छोडऩे से पूर्व हूटर हाइड्रो प्रबंधन बजाते है, ताकि नदी नाले से लोग दूरी बना ले। आपदा आने का पता किसी को नहीं होता।

प्रकृति से छेड़छाड़ के भयंकर परिणाम

प्रकृति से छेड़छाड़ के भयंकर परिणाम सामने आ रहे हैं। दूसरी तरफ जल संसाधनों और आजीविका पर भी काफी असर पड़ा है। यूएनडीआरआर की यह तक अनुमान लगाया है कि तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण मीठे पानी की कमी खलेगी और भविष्य में 1.9 अरब आबादी जल संकट की समस्या से प्रभावित होगी।

पहाड़ों पर घर, सडक़ों का जाल खतरनाक

विशेषज्ञों का मानना है हिमालयी क्षेत्र में लोगों की बढ़ती गतिविधियों, फोरलेन व पहाड़ों पर सडक़ों का जाल, सडक़ व नदी के किनारे घनी आबादी बढऩे पर ही गंभीर परिणाम देखने को मिल रहे हैं। नतीजन ग्लेशियर झीलों के फटने से होने वाली तबाही और नुकसान को रोकना मुश्किल नजर आ रहा है, लेकिन नेपाल में हुई तबाही से मिले जख्मों से सबक लेते हुए जान माल को बचाने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं ।

अब हर साल आ रही आपदा

पहले आपदा घटित होने का अंतराल लंबा रहता था , लेकिन अब हर साल आपदा की घटनाएं होनी शुरू हो गई है। फोरलेन निर्माण में 90 डिग्री पहाड़ की कटिंग भी घातक साबित हुई है। फोरलेन सडक़ निर्माण से कुल्लू से चंडीगढ़ का सफर में खुशी के साथ भू-स्खलन के खतरे काफी बढ़ गए हैं।

तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर

डा. संजीव शर्मा

मानव पारिस्थितिकीय क्षेत्रीय भूगोलय पर्यावरणीय प्रभाव आकलन एवं प्रबंधनय पर्यावरण प्रबंधन एवं प्रकृति संरक्षणय विज्ञान, समाज एवं प्रकृति अध्ययनय भू-दृश्य विकास एवं प्रबंधनय जनजातीय अध्ययन (पर्वतीय परिप्रेक्ष्य) में विशेषयज्ञ डा. संजीव शर्मा एसोसिएट प्रोफेसर जेएनयू दिल्ली से बात की तो उन्होंने कहा कि हिमालय रेंज और पर्वतीय इलाकों गतिविधियों के बने से पर्यावरण पर काफी असर पड़ा है और तापमान में बढ़ोतरी होने से ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार भी बड़ी है ।

हमारे सामने कई तरह के खतरे सामने है। आचानक बाढ़ की स्थिति में डाटा शेयरिंग पर ध्यान देने की जरूरत है। हूटर सिस्टम के साथ लोगों को भी जागरूक रहने की जरूरत है। खतरों बाले इलाके और नदियों के किनारे निर्माण पर टीसीपी विभाग की जिम्मेदारी सुनिस्चित करनी चाहिए

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