सावधान ! हिमाचल में बढ़ रहे इस खतरनाक बीमारी के मरीज
मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट… हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। एक पल के लिए इंसान खाना भूल सकता है, लेकिन मोबाइल से दूरी नहीं बना पाएगा।
हो भी क्यों न हो, ये वो डिवाइस हैं जिसने हमारे काम को आसान कर दिया है। पेमेंट करनी है तो मोबाइल, शोपिंग करनी है तो मोबाइल, फीस भरनी है तो मोबाइल, स्कूल के काम के लिए मोबाइल, नई डिश बनाने के लिए मोबाइल और अब तो दफ्तर का काम करने के लिए भी लैपटाप से ज्यादा मोबाइल का इस्तेमाल हो रहा है।
इस 5 से 6 इंच की सक्रीन ने पूरी दुनिया को कैद कर लिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि घंटों तक स्क्रीन के सामने बैठना, दिन भर mobile चलाते रहना आज के दौर में किस तरह से हमारी आंखों पर भारी पड़ रहा है।
देश के कई अस्पतालों में इन दिनों डिजिटल आई सिंड्रोम के मामले सामने आ रहे हैं। हमसे पहले वाली पीढ़ी ने शायद ही इस बीमारी का कभी नाम भी सुना होगा, लेकिन आज ये आम है।
हिमाचल में भी कई जगह ऐसे मामले देखें गए हैं। सोलन में मोबाइल और अन्य डिजिटल स्क्रीन का बढ़ता उपयोग आंखों की सेहत पर भारी पड़ रहा है।
क्षेत्रीय अस्पताल सोलन की नेत्र ओपीडी में हर दिन 25 से 30 मरीज डिजिटल आई सिंड्रोम की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। तो सोचिए बाकी जिलों का क्या हाल होगा।
आज अधिकतर युवा पीढ़ी यहां तक कि स्कूल जाने वाले बच्चे भी आंखों में जलन, धुंधला दिखना, सिरदर्द और लगातार थकान की शिकायत कर रहे हैं।
ये सिर्फ मामूली परेशानी नहीं, बल्कि डिजिटल आई सिंड्रोम के संकेत हो सकते हैं। इसकी पीछे की वजह है सुबह उठते ही मोबाइल-ऑफिस में कंप्यूटर, और रात को फिर सोशल मीडिया।
यहां तक कि स्कूली बच्चों के लिए जबसे ऑनलाइन क्लासिस का चलन शुरु हुआ था, उसके बाद से तो बच्चो को मोबाइल की ऐसी लत लगी है कि अब फोन हाथ से छुटता ही नहीं।
वहीं दूसरी ओर युवा पीढ़ी के तो 8 से 10 घंटे रोजाना स्क्रीन के सामने ही गुजरते हैं। जिससे स्क्रीन देखने से आंखों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, इसे ही आसान भाषा में डिजिटल आई सिंड्रोम या कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम कहा जाता है।
दरअसल होता कुछ ऐेसे है कि जब हम स्क्रीन चलाते हैं तो लंबे समय तक अपनी पलकों को नहीं झपकते। सामान्य तौर पर आम व्यक्ति एक मिनट में 15 से 20 बार पलक झपकाता है, लेकिन स्क्रीन देखते समय यह संख्या घटकर 5 से 7 बार तक रह जाती है।
इसकी वजह आंखों का प्राकृतिक नमी संतुलन बिगड़ जाता है और आंखों में सूखापन, जलन और थकान महसूस होने लगती है। कई बार आंखों में रेत या किरकिरी फंसने जैसा भा महसूस होता है।
जाहिर है अगर इन संकेतों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाए तो काम की क्षमता और जीवन की गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
एसएमओ सोलन डॉ. राकेश पवार के मुताबिक, इस समस्या से बचने के लिए 20-20-20 नियम अपनाना बेहद कारगर है। यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए लगभग 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें।
इसके साथ ही बार-बार पलकें झपकाएं, स्क्रीन की ब्राइटनेस और कॉन्ट्रास्ट सही रखें, स्क्रीन को आंखों से लगभग 20 से 24 इंच दूर रखें और अच्छी रोशनी में ही काम करें…और नियमित रूप से आंखों को आराम देते रहें।
यही नहीं विशेषज्ञ ये भी कहते हैं कि अगर आंखों में लगातार जलन, धुंधलापन या सिरदर्द बना रहे तो खुद से आई ड्रॉप्स लेने की बजाय नेत्र विशेषज्ञ से जांच करवाना जरूरी है।
कई बार चश्मे का नंबर बदलना, ड्राई आई या दूसरी आंखों की बीमारियां भी इसके पीछे वजह हो सकती हैं। इसलिए सही इलाज मिलना जरूरी है, और सबसे अहम बच्चों को किसी भी हाल में मोबाइल की लत न लगाएं।
वरना कम उम्र में आंखों की रोशनी धुंधली हो सकती है। हमे समझना होगा कि तकनीक हमारी सुविधा के लिए है, लेकिन अगर उसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया जाए तो वही सुविधा सेहत पर बोझ बन सकती है।
