देवी-देवताओं में अटूट आस्था का प्रतीक है कुल्लू दशहरा

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आधुनिकता के दौर में भले ही हर क्षेत्र में परिवर्तन आ गया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में 372 साल पुरानी देव परंपराओं का अटूट आस्था का निर्वहन होता है। ढालपुर में होने वाले देवी-देवताओं के महाकुंभ के प्रति लोगों में अटूट आस्था है और आज भी देव और मानस का यह भव्य देव मिलन पूरे विश्वभर में विख्यात है।

यह पर्व ढालपुर मैदान में मनाया जाता है और सैकड़ों देवी-देवता अपनी हाजिरी भगवान रघुनाथ के दरबार में भरते है। कई किलोमीटर सफर के बाद देवी-देवता आराध्य रघुनाथ के समक्ष देवविधि के अनुसार मिलन करते हैं। 1650 में तत्कालीन राजा जगत सिंह ने कुल्लू दशहरे का आगाज किया था और उन्होंने अपना राजपाठ रघुनाथ के चरणों में समर्पित कर दिया था।

रघुनाथ के छड़ीबरदार के रूप में सेवा करने का संकल्प लिया। आज भी जगत सिंह के वंशज बखूबी से इस रस्म को निभा रहे हैं। दशहरे में आने वाले देवी-देवता के आदेश को लोग बड़ी सादरता से स्वीकार करते हैं।

भगवान रघुनाथ की पहले दिन होने वाली शोभा यात्रा में कुल्लू राजघराने का पूरा परिवार पारंपरिक वेशभूषा में सजधज कर शामिल होता है। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में हर साल जिला से सैकड़ों देवी-देवता शामिल होने के लिए आते हैं। ढालपुर के मैदान में हर वर्ष देव परंपरा के साथ दशहरा उत्सव मनाया जाता है।

भगवान रघुनाथ की प्रतिमा को सबसे पहले धार्मिक नगरी मणिकर्ण में रखा था। 1651 में रघुनाथ, सीता और हनुमान की मूर्तियों को अयोध्या से दामोदर दास लाकर राजा के आदेश के अनुसार धार्मिक तीर्थ स्थल मणिकर्ण में रखा गया था।

कहा जाता है कि दशहरा का पहला आयोजन मणिकर्ण में आयोजित किया गया। वर्ष 1660 में तत्कालीन राजा जगत सिंह ने विधि विधान के अनुसार कुल्लू के सुल्तानपुर में रघुनाथ की नगरी में स्थापित किया और कुल्लू दशहरा का सफर भी आरंभ हुआ।

वर्ष 1971 में कुल्लू दशहरा में गोलीकांड हुआ था। इस दौरान दशहरा उत्सव में भगदड़ मच गई थी और श्यामा नाम के व्यक्ति की गोली की चपेट आने से मौत हुई थी।

इस पर लोकगीत है जो….ओ मेरी गोलीएं ओ मेरी बंदूके… की पंक्तियों से गूंजता है। गोलीकांड के कारण 1972-73 में कुल्लू का दशहरा भी नहीं मनाया गया था।

वर्ष 1978 में कुल्लू दशहरा तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह ने दोबारा मनाना शुरू किया। हर साल एक हफ्ते तक मनाए जाने वाले उत्सव में सैकड़ों देवी देवताओं के आने से भगवान रघुनाथ की नगरी स्वर्ग लोक में तब्दील हो जाती है। इसके लिए देव समाज एक माह पहले से ही तैयारी शुरू कर देता है।

झारी, धड़छ, घंटी, शहनाई, ढोल-नगाड़े, करनालनरसिंगों की स्वरलहरियों से ढालपुर का नजारा देवमय हो जाता है। देशी-विदेशी पर्यटक भी इस शानदार व अलौकिक दृश्य को अपने कैमरे में कैद करते हैं।

दशहरा में आने वाले सैकड़ों देवी देवताओं के मुख्य कारकूनदेवलु दशहरा उत्सव के सात दिनों तक अस्थायी शिविरों में तपस्वियों की तरह जीवन यापन करेंगे। देवी देवताओं के कड़े नियमों से बंधे होने के कारण देवता के कारकून अस्थायी शिविरों से बाहर नहीं जा सकते और वह चाय व खाना भी बाहर नहीं खा सकते।

भगवान रघुनाथ की रथयात्रा आरंभ होने से पहले दशहरा में आने वाले सभी देवी देवता सबसे पहले रघुनाथपुर रघुनाथ के देवालय में जाकर मिलन करते हैं। उत्सव के छठे दिन भी तमाम देवी देवता भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर में हाजिरी भरते हैं।

इसके बाद सभी देवतागण ढालपुर स्थित राजा की चानणी की भी परिक्रमा करते हैं और लंका दहन की चढ़ाई करने से पूर्व सभी देवी देवता भगवान रघुनाथ को शक्तियां प्रदान करते हैं।

देवी-देवताओं का आपसी देव मिलन दर्शकों के लिए अदभुत व भावुक भरा लम्हा होता है। इस दौरान जय श्री राम के उदघोष के साथ राजपरिवार की कुलदेवी माता हिडिंबा, माता दोचा मोचा, माता शरबरी सहित अन्य देवियां भी लंका की रस्म के लिए आयोजन स्थल पर पहुंचेगी।

लंका पर विजय पाने के बाद भगवान रघुनाथ देवी देवताओं के साथ अपने मंदिर रवाना होते हैं। इस अलौकिक व भव्य दृश्य को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है।

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