किन्नौर में कई दशकों बाद दिखा दुर्लभ पौधा ‘घोस्ट ऑर्किड’
हिमाचल प्रदेश के किन्नौर ज़िले के रक्षम-चितकुल वन्यजीव अभयारण्य में कई दशकों बाद एक दुर्लभ दिखने वाला आर्किड प्रजाति का पौधा ‘घोस्ट ऑर्किड’ (एपोजियम एफाइलम) देखा गया है।
यह हिमाचल प्रदेश के वनस्पति रिकॉर्ड में एक अहम बढ़ोतरी है। इस ऑर्किड को वन अधिकारी संतोष ठाकुर, वन मित्र कल्पना नेगी और सांगला वन्यजीव टीम ने नियमित क्षेत्र निगरानी के दौरान रक्षम इलाके में देखा। टीम ने इस प्रजाति को उसके प्राकृतिक आवास में देखने के बाद इन पौधों की तस्वीरें लीं और अपने अनुभव दर्ज किए।
संतोष ठाकुर ने इस खोज के बारे में बात करते हुए कहा, “जब हमने इस इलाके में खोज की, तो हमें इस दुर्लभ घोस्ट ऑर्किड के सिर्फ़ चार पौधे ही मिल पाए।” उन्होंने कहा कि पौधों की कम संख्या इस प्रजाति की दुर्लभता और इसके लिए ज़रूरी खास पारिस्थितिकी स्थितियों को दिखाती है।
उन्होंने कहा, “एपोजियम एफाइलम बिना पत्तियों वाला ऑर्किड है जिसमें क्लोरोफिल (हरित लवक) नहीं होता और इसलिए यह प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए खाना नहीं बना सकता।
यह एक माइकोहेटरोट्रॉफ़िक प्रजाति है जो अपने पोषण के लिए जंगल के इकोसिस्टम से जुड़े खास फ़ंगस पर निर्भर करती है। यह पौधा अपनी ज़िंदगी का ज़्यादातर समय जड़ों (राइज़ोम) के ज़रिए ज़मीन के नीचे बिताता है और सिर्फ़ अनुकूल पर्यावरणीय स्थितियों में ही ज़मीन के ऊपर आता है।
इसका फूल वाला तना गायब होने से पहले सिर्फ़ 10 से 12 दिनों तक ही दिख सकता है, और पौधा कई सालों तक ज़मीन के नीचे रह सकता है। इसी अनोखे व्यवहार की वजह से इसे ‘घोस्ट ऑर्किड’ नाम मिला है।”
हिमाचल प्रदेश से इस प्रजाति के ऐतिहासिक रिकॉर्ड बहुत कम मिले हैं। वनस्पति विज्ञानी हेनरी कोलेट ने 1921 में शिमला ज़िले के फागू में इस ऑर्किड के होने की जानकारी दी थी। बाद में 1959 में डॉ. राउ और 1980 के दशक में डॉ. वैद्य का पादप संग्रह में यह शामिल हुआ।
हिमाचल प्रदेश के रिटायर्ड और जाने-माने टैक्सोनॉमिस्ट डॉ. गुरिंदरजीत सिंह गोराया ने हालिया रिकॉर्ड को एक अहम वानस्पतिक खोज बताया और कहा कि घोस्ट ऑर्किड, हिमाचल प्रदेश के सबसे दुर्लभ ऑर्किड में से एक है।
उन्होंने कहा कि राज्य से इस प्रजाति के मौजूदा प्रमाणित रिकॉर्ड बहुत कम हैं और यह पूर्वोत्तर भारत तथा चीन के उपयुक्त पहाड़ी इलाकों में तुलनात्मक रूप से ज़्यादा आम है।
वनस्पति शास्त्र के प्रोफेसर और वनस्पति विशेषज्ञ डॉ. भगवती प्रसाद शर्मा ने बताया कि एपोजियम जीनस की दुनिया भर में लगभग आठ प्रजातियां हैं, जिनमें से तीन भारत में पाई गई हैं।
इस जीनस की दो प्रजातियां हिमाचल प्रदेश में पाई जाती हैं। उन्होंने बताया कि एपोजियम एफाइलम यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में समशीतोष्ण जंगलों में पाया जाता है। भारत में इसे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में देखा गया है, जो आमतौर पर 2,800 से 3,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं।
टैक्सोनॉमिस्ट डॉ. आशुतोष शर्मा ने कहा कि सांगला घाटी में यह खोज बहुत अहम है और इससे किन्नौर और पश्चिमी हिमालय में इस प्रजाति के प्रसार और पारिस्थितिकी के बारे में जानकारी बढ़ाने में काफी मदद मिलेगी। शिमला वाइल्डलाइफ (दक्षिण) की मुख्य वन संरक्षक, प्रीति भंडारी ने क्षेत्रीय टीम को बधाई दी और लगातार वैज्ञानिक खोज,जैव विविधता की निगरानी और संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के महत्व पर ज़ोर दिया।
वाइल्डलाइफ के डिप्टी कंज़र्वेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट, अशोक नेगी ने भी सांगला वन्यजीव टीम की कोशिशों की सराहना की। किन्नौर के डिप्टी कमिश्नर डॉ. अमित कुमार ने टीम को बधाई दी और कहा कि लगातार खोज से सांगला घाटी में और भी दुर्लभ पौधों की प्रजातियों की खोज और दस्तावेजीकरण हो सकता है।
यह रिकॉर्ड हिमाचल प्रदेश की समृद्ध लेकिन अभी तक कम खोजी गई वानस्पतिक विविधता और दुर्लभ हिमालयी प्रजातियों के संरक्षण के लिए नियमित क्षेत्रीय सर्वेक्षण और वैज्ञानिक रिकार्ड के महत्व को दर्शाता है।






