1% से भी कम वोट से बदल गई सरकार, 37947 ज्यादा वोट मिलने से बढ़ गई कांग्रेस की 15 सीटें

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हिमाचल में पहले कहा जाता था कि सरकार बदलने के लिए सिर्फ अढ़ाई लाख वोट ज्यादा चाहिए, लेकिन इस बार तो हद ही हो गई। कांग्रेस को 40 सीटें मिली और भाजपा को 25, लेकिन इन 15 ज्यादा सीटों का फैसला महज एक फ़ीसदी से कम वोट से हो गया। विधानसभा चुनाव में वोट शेयर की बात करें तो भाजपा को इस बार 43 फ़ीसदी वोट मिले हैं। कुल मतों में से इनकी संख्या 1814530 है, जबकि कांग्रेस को 43.9 फ़ीसदी वोट पड़े और इनकी संख्या 1852504 है। मतलब यह है कि कांग्रेस को भाजपा से 37947 वोट ज्यादा मिले और इसी अंतर में 15 सीटें कांग्रेस को ज्यादा मिल गई। बागी होकर चुनाव लड़े निर्दलीयों ने भी 10 फ़ीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल किया है। इन्हें पूरे प्रदेश में 436413 वोट पड़े हैं, जबकि आम आदमी पार्टी एक फ़ीसदी पर ही सिमट के रह गई। माकपा को एक फ़ीसदी से भी कम वोट मिला और नोटा भी आधा फ़ीसदी तक ही पहुंच पाया। इस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच में वोट शेयर का अंतर हैरान करने वाला है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 1846000 वोट मिले थे, वहीं इस बार 1814000 मिले हैं, लेकिन इतने कम अंतर से कांग्रेस के मुकाबले 15 सीटों का फर्क आ गया है। विधानसभा चुनाव में कुल वोट प्रतिशत भी बढक़र 75.78 फ़ीसदी हो गया है। इससे पहले यह माना जाता था कि हिमाचल में सरकार बदलने के लिए चार से सात फ़ीसदी वोट सिंह की जरूरत होती है, लेकिन इस बार तो 1 फ़ीसदी से कम में ही फैसला हो गया। यह अपने आप में नया रिकॉर्ड होगा। हिमाचल की राजनीति में वोट का विभाजन 1998 में हुआ था, जब पं. सुखराम ने हिमाचल विकास कांग्रेस बनाकर मंडी जिला को बांट दिया था। उस चुनाव में कांग्रेस को भाजपा से 1.14 लाख वोट ज्यादा मिले थे, लेकिन दोनों दलों की सीटें 31-31 ही आई थी। हिविंका ने इस चुनाव में करीब अढ़ाई लाख वोट लेकर 5 सीटें हासिल कर ली थी और धूमल पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। फिर से अगला चुनाव 2003 में हुआ, जब महज 1.71 लाख ज्यादा वोट के अंतर से कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की थी। हिविंका ने इस चुनाव में करीब अढ़ाई लाख वोट लेकर 5 सीटें हासिल कर ली थी और धूमल पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। फिर से अगला चुनाव 2003 में हुआ, जब महज 1.71 लाख ज्यादा वोट के अंतर से कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की थी।
इसके बाद 2007 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा और कांग्रेस के वोट का अंतर महज 1.60 लाख था, लेकिन भाजपा की सीटें कांग्रेस से दोगुनी थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में भी यह अंतर और कम हुआ, क्योंकि करीब 4 लाख वोट निर्दलीय ले गए और 05 जीत कर भी आए। इस चुनाव में कांग्रेस को भाजपा से 146563 वोट ज्यादा मिले, जबकि 10 सीटें ज्यादा आ गई। 2017 के पिछले विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने कांग्रेस से 228982 वोट ज्यादा लिए और सीटें भी दोगुनी से ज्यादा आईं।

हिमाचल प्रदेश की 14वीं विधानसभा में 21 नए चेहरे

शिमला — चौहदवीं विधानसभा में 18 सीटों में से करीब 21 सीटों पर नए चेहरे जीत कर आए हैं। इनमें से सबसे ज्यादा कांग्रेस में तेरह, भाजपा में सात और एक निर्दलीय विधायक बने हैं। कांग्रेस में पहली बार विधानसभा एंटर करने में शिमला शहरी से हरीश जनार्था, ठियोग से कुलदीप राठौर, धर्मपुर से चंद्रशेखर, नगरोटा बगवा से आरएस बाली, शाहपुर से केवल सिंह पठानिया, कसौली से विनोद सुल्तानपुरी, नाहन से अजय सोलंकी, भोरंज से सुरेश कुमार, चंबा शहरी से नीरज नैयर, मनाली से भुवनेश्वर गौड़, गगरेट से चैतन्य शर्मा, कुटलैहड़ से देवेंद्र भुट्टो और चिंतपूर्णी से सुदर्शन बबलू शामिल हैं। यदि भाजपा की बात करें तो भाजपा ने सबसे ज्यादा 25 नए चेहरे इस बार अपने टिकट पर मैदान में उतारे थे। इनमें से सरकाघाट से दिलीप ठाकुर, करसोग से दीप राज कपूर, नूरपुर से रणवीर निक्का, बिलासपुर शहरी से त्रिलोक जमवाल, भरमौर से डा. जनक राज, डलहौजी से डीएस ठाकुर और अन्य से लोकेंद्र ने चुनाव जीत लिया है, जबकि हमीरपुर शहरी सीट से आशीष शर्मा निर्दलीय विधायक के तौर पर पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं।

हिमाचल में बदला राज; कांग्रेस ने जीती 40 सीटें, बागियों ने बिगाड़ा भाजपा का खेल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हिमाचल दौरा और कांग्रेस के दिवंगत दिग्गज वीरभद्र सिंह के न होने के बावजूद हिमाचल में भाजपा बारी-बारी की सत्ता का रिवाज नहीं बदल पाई है। भाजपा गुजरात में बेशक एकतरफा जीत हासिल कर फिर सत्ता में आई हो, लेकिन हिमाचल में अच्छे बहुमत से कांग्रेस की सरकार बन गई है। गुरुवार को सामने आए चुनाव नतीजों में कांग्रेस को 68 विधानसभा सीटों में से 40 सीटें हासिल हुई हैं। बहुमत का आंकड़ा 35 सीटों का था, जो कांग्रेस ने आराम से पार किया। सत्तारूढ़ दल भाजपा सिर्फ 25 सीटों पर ही सिमट गई और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के आठ कैबिनेट मंत्री चुनाव हार गए हैं। चार जिले भाजपा मुक्त हो गए हैं। इनमें सोलन, लाहुल-स्पीति, किन्नौर के अलावा भाजपा का गढ़ रहा हमीरपुर जिला भी शामिल है। राज्य के दो बड़े जिलों कांगड़ा और शिमला ने कांग्रेस का पूरा साथ दिया है। कांगड़ा में कांग्रेस को दस और शिमला में सात सीटें मिल गई हैं। भाजपा का साथ मंडी ने दिया है, जो मुख्यमंत्री का जिला है। यहां नौ सीटें भाजपा ने जीती हैं, जबकि धर्मपुर में पार्टी को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा है। यहां महेंद्र सिंह ठाकुर का 33 साल पुराना किला ढह गया है। उनके बेटे रजत ठाकुर कांग्रेस प्रत्याशी चंद्रशेखर से चुनाव हार गए। यह बात अलग है कि प्रेम कुमार धूमल के चुनाव से हटने के बाद हमीरपुर जिला में भाजपा जीरो पर आ गई है। भाजपा का गढ़ रही भोरंज सीट भी इस बार नहीं बची। इस चुनाव में बागियों ने भाजपा का खेल बिगड़ा और करीब 18 सीटों पर चुनाव लडऩे के बाद दस सीटें भाजपा ने बगावत की वजह से हारी तीन निर्दलीय भी चुनाव जीत कर आए हैं। HP-Election-Congress-won-40-seats,-rebels-spoiled-BJP's-game-1 इनमें नालागढ़ से भाजपा के बागी केएल ठाकुर हमीरपुर से आशीष शर्मा और देहरा से होशियार सिंह शामिल हैं। होशियार सिंह ने लगातार दूसरा चुनाव बतौर निर्दलीय जीता है। चुनाव में कई दिग्गजों को हार का सामना भी करना पड़ा। कांग्रेस की तरफ से नवमी बार विधानसभा में आने के लिए चुनाव लड़ रहे ठाकुर कौल सिंह द्रंग से हार गए। आशा कुमारी डलहौजी सीट पर खुद को नहीं बचा पाई और श्री नैना देवी सीट पर रामलाल ठाकुर भी रणधीर शर्मा के हाथों हार गए। यदि भाजपा की बात करें तो जयराम सरकार के नौ कैबिनेट मंत्री चुनाव में नहीं जीत पाए। मुख्यमंत्री के अलावा सिर्फ दो कैबिनेट मंत्री विक्रम सिंह ठाकुर और सुखराम चौधरी ही चुनाव जीत पाए। अन्य आठ कैबिनेट मंत्री चुनाव हार गए और महेंद्र सिंह ने अपनी जगह बेटे को लड़ाया वह भी नहीं जीत पाए। नई विधानसभा में 21 चेहरे ने चुनाव जीत कर आए हैं, जिनमें से सबसे ज्यादा 13 विधायक कांग्रेस में जबकि सात भाजपा में हैं। एक निर्दलीय भी पहली बार आए हैं। (एचडीएम)

राहुल गांधी-खडग़े और प्रियंका ने जताया हिमाचल की जनता आभार

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी तथा पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वढेरा ने हिमाचल प्रदेश विधानसभा में पार्टी को मिले बहुमत पर प्रदेश की जनता का आभार जताते हुए कांग्रेस कार्यकर्ताओं को धन्यवाद दिया है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि विधानसभा प्रदेश की जनता ने कांग्रेस पर जो भरोसा जताया है, उसके अनुरूप उनकी पार्टी की सरकार काम करेगी। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को भी धन्यवाद दिया कि उनकी मेहनत की वजह से ही यह जीत संभव हो पाई है। राहुल गांधी ने ट््वीट किया कि हिमाचल प्रदेश की जनता को इस निर्णायक जीत के लिए दिल से धन्यवाद। सभी कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को हार्दिक बधाई। आपका परिश्रम और समर्पण इस विजय की शुभकामनाओं का असली हकदार है। जनता को किया हर वादा जल्द से जल्द निभाएंगे।

उम्मीदों पर खरा उतरेगी कांग्रेस

मुकेश अग्रिहोत्री ने कहा है कि कांग्रेस को प्रदेश के सभी लोगों का साथ मिला है। पार्टी अब लोगों की उम्मीदों को पूरा करने में जुटेगी। उन्होंने लगातार पांचवीं बार विधायक बनने पर हरोली के लोगों का धन्यवाद भी किया। अग्रिहोत्री ने कहा कि इस बार कांग्रेस ने जो मुद्दे लोगों के सामने रखे थे, उन्हीं मुद्दों पर कांग्रेस को जीत मिली है। अब ओपीएस समेत अन्य सभी मसलों का निपटारा जल्द होगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस उम्मीदों पर खरा उतरेगी।

बुजुर्ग-महिलाओं और युवाओं की जीत

कांग्रेस प्रचार समिति के अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने पार्टी की जीत पर प्रदेशवासियों को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि चुनाव में बुजुर्ग, युवाओं और महिलाओं का पूरा साथ कांग्रेस को मिला है। कांग्रेस ने जो भी वादे किए थे, उन्हें निभाने का वक्त आ गया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करेगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश में कांग्रेस को मिली जीत सबकी है।

जयराम कैबिनेट के नौ मंत्री हारे; आठ ने खुद चुनाव लड़ा था, एक ने बेटे को उतारा था विधानसभा चुनाव में

हिमाचल विधानसभा के चुनाव जयराम सरकार की कैबिनेट के लिए बिलकुल अच्छे नहीं रहे। हिमाचल में विधानसभा सीटों की संख्या सीमित होने के कारण मुख्यमंत्री समेत कुल 12 कैबिनेट मिनिस्टर ही होते हैं। इनमें से सिर्फ तीन चुनाव जीते हैं, जबकि नौ चुनाव हार गए हैं। हिमाचल में कैबिनेट मंत्री पहले भी चुनाव हारते रहे हैं, लेकिन इस बार सबसे ज्यादा संख्या चुनावी हार की है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने अपने चुनाव क्षेत्र सिराज से सर्वाधिक 38183 वोट के अंतर से जीत का रिकॉर्ड बनाया है, लेकिन उनके अलावा जसवां प्रागपुर से उद्योग मंत्री बिक्रम सिंह ठाकुर और पांवटा साहिब से ऊर्जा मंत्री सुखराम चौधरी ही अपनी सीट बचा पाए। बाकी आठ कैबिनेट मंत्री चुनाव हार गए और एक कैबिनेट मंत्री ने अपने बेटे को चुनाव मैदान में उतारा था, वह भी नहीं जीत पाए। हारने वाले मंत्रियों में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री सरवीन चौधरी, स्वास्थ्य मंत्री डा. राजीव सहजल, शहरी विकास मंत्री सुरेश भारद्वाज, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री राजेंद्र गर्ग, तकनीकी शिक्षा मंत्री डा. रामलाल मार्कंडेय, शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर, पंचायती राज मंत्री वीरेंद्र कंवर और वन मंत्री राकेश पठानिया शामिल हैं। पार्टी ने सुरेश भारद्वाज और राकेश पठानिया का चुनाव क्षेत्र बदला था और आखिरी वक्त में इन्हें नए चुनाव क्षेत्र में भेजा था। धर्मपुर से जलशक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर चुनाव से हट गए थे और अपने बेटे रजत ठाकुर को चुनाव मैदान में उतारा था। वह भी चुनाव हार गए। हिमाचल में हर बार 45 से 75 प्रतिशत मंत्री चुनाव हारते रहे हैं। हिमाचल में मंत्रियों के चुनाव हारने का ये ट्रेंड 1990 से चला आ रहा है। वर्ष 2012 से 2017 तक हिमाचल में कांग्रेस की सरकार रही। तब वीरभद्र कैबिनेट के पांच मंत्री कौल सिंह ठाकुर, जीएस बाली, प्रकाश चौधरी, सुधीर शर्मा और ठाकुर सिंह भरमौरी चुनाव हार गए थे।

पहले भी हारे हैं मंत्री

वर्ष 2007 से 2012 तक प्रेम कुमार धूमल कैबिनेट के चार मंत्री चुनाव हारे थे। तब नरेंद्र बरागटा, किशन कपूर, खीमीराम और रमेश धवाला चुनाव हार गए। वर्ष 2003 से 2007 वीरभद्र कैबिनेट में छह मंत्री कुलदीप, रामलाल ठाकुर, चंद्र कुमार, सिंघी राम, प्रकाश चौधरी और सत महाजन अपनी विधानसभा सीट बचा नहीं पाए थे। वर्ष 1998 से 2003 तक प्रेम कुमार धूमल मंत्रिमंडल के सात मंत्री रामलाल मार्कंडेय, नरेंद्र बरागटा, रूप सिंह, मनसा राम, प्रवीण शर्मा, विद्या सागर चौधरी जीत नहीं पाए थे।

अपने चेले से हार गए कौल सिंह; द्रंग से 11 चुनाव लड़े; आठ जीते, तीन हारे, अब समाप्ति पर राजनीति

1970 के दशक के कांग्रेस नेताओं में शामिल व प्रदेश की सक्रिय राजनीति में अहम स्थान रखने वाले कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व दिग्गज नेता कौल सिंह ठाकुर को लगातार दूसरी बार हार का मुंह देखना पड़ा है।
मंडी जिला के द्रंग विस से कांगे्रेस के पूर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर इस बार भी मुख्यमंत्री बनने का नारा जोरशोर से लगाने के बाबजूद चुनाव नहीं जीत सके हैं। 2017 के चुनावों को भी कौल सिंह ठाकुर ने अपना अंतिम चुनाव बताने के साथ ही मुख्यमंत्री बनने का नारा द्रंग विस क्षेत्र में दिया था, लेकिन उन्हें तब भी करारी हार का सामना करना पड़ा था।
अब उन्हें दूसरी बार अपने चेले पूर्ण चंद ठाकुर की वजह से सत्ता से बाहर होना पड़ा है। यही नहीं सदर मंडी से चुनाव लड़ रही उनकी बेटी भी परिवारवाद के नारे के चलते 10006 वोटों से चुनाव हार गई हैं। हालांकि कौल सिंह ठाकुर को इस बार 618 मतों से ही हार मिली है, लेकिन भाजपा के भीतरघात के बाबजूद वह नहीं जीत सके हैं।
जबकि पिछले चुनाव में उन्हें 6541 मतों से हार मिली थी। उस समय पूर्ण चंद ठाकुर ने बागी होकर चुनाव लड़ा था और कौल सिंह ठाकुर की हार के पीछे बगाबत को वजह बताया गया था, लेकिन इस बार सीधे व एकतरफा मुकाबले में भी कौल सिंह ठाकुर अपने चेले पूर्ण चंद ठाकुर को नहीं हरा सके हैं।
ईवीएम में पिछडऩे के बाद पोस्टल बैलेट से जीत भरोसा लगा बैठे कौल सिंह ठाकुर को पोस्टल बैलेट से 1098 और पूर्ण चंद ठाकुर को 729 मत मिले हैं, लेकिन इसके बाद भी कौल सिंह ठाकुर नहीं जीते हैं।
बता दें कि अब तक कौल सिंह ठाकुर 11 चुनाव लड़ चुके हैं और उसमें से उन्हें तीन चुनावों में हार मिली है, लेकिन अहम यह है कि अब वह लगातार दो चुनाव हार गए हैं। जिसके बाद दं्रग में कांग्रेस के नेतृत्व को लेकर अब सवाल उठना शुरू हो जाएंगे और कौल सिंह ठाकुर की राजनीतिक पारी भी समाप्ति की और नजर आ रही है।
इस बार के चुनावों में भाजपा प्रत्याशी पूर्ण चंद ठाकुर को 36572 और कौल सिंह ठाकुर को 35954 मत मिले हैं। कौल सिंह ठाकुर अगर इस बार चुनाव जीत जाते तो मुख्यमंत्री बनने की रेस में वर्तमान हालात में सबसे आगे जरूर होते। (एचडीएम)

धूमल की अनदेखी बीजेपी को पड़ी भारी; अगर पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव लड़ते, तो कुछ और होता स्नैरियो

प्रदेश भर में 25 सीटों पर सिमटने वाली भारतीय जनता पार्टी की हार की भले ही कई वजह रही हों, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल की अनदेखी को पार्टी की हार की एक बड़ी वजह के रूप में देखा जा रहा है।
दो बार बतौर मुख्यमंत्री प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रो. धूमल का हमीरपुर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में अपना एक अलग वोट बैंक रहा, क्योंकि लगभग हर जिले में उनके समर्थक माने जाते हैं। 2017 का चुनाव भले ही प्रो. धूमल हार गए थे, लेकिन उन्होंने फिर से खुद को संभाला और सक्रिय किया और लगभग साढ़े चार साल तक लगातार पार्टी के लिए काम करते रहे।
उनकी सक्रियता के कारण पार्टी और समर्थकों में बढ़ते उनके प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले लगभग साढ़े चार वर्षों में धूमल या उनके परिवार से जुड़ा किसी भी तरह का छोटा-बड़ा आयोजन हुआ।
चंबा से लेकर किन्नौर और सिरमौर तक के पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके घर हाजिरी लगाई। उनके समर्थक भी चाहते थे कि वह चुनाव लड़ें शायद यही वजह थी कि चुनावों से पहले करीब एक साल से प्रो. धूमल ने हर मंच से कहा कि पार्टी कहेगी, तो वह चुनाव लड़ेंगे, लेकिन आखिर में चुनावी बेला के दौरान पार्टी में जो पका और परोसा गया, वह धूमल समर्थकों को हजम नहीं हो पाया।
अंदर ही अंदर उनके समर्थकों में एक रोष और निष्क्रियता भी बढ़ गई, जिसका नतीजा आज सबके सामने है। हालांकि ऐसा नहीं कि धूमल ने चुनावों में काम नहीं किया, वह पार्टी प्रत्याशियों के प्रचार में लगे रहे, लेकिन जो लोग उनके लिए प्रचार करना चाहते थे, उनका उत्साह कम हो गया।
जानकारों की मानें, तो जिस तरह इस बार पहली दफा हमीरपुर से बीजेपी का सूपड़ा साफ हुआ है, वह कभी न होता यदि धूमल सक्रिय राजनीति में रहते, यदि उनसे भी चुनाव लड़वाया जाता। प्रचार-प्रसार पर करोड़ों खर्चने के बाद भी जो पार्टी 25 के आंकड़े में सिमट गई, वह 30 के पार होती और बीजेपी का रिवाज बदलने का सपना भी कहीं न कहीं पूरा हो सकता था।

चंडीगढ़ में 40 विधायक तय करेंगे सीएम फेस; कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष ने बुलाई बैठक, सभी विधायक बुलाए

चुनाव नतीजों के बाद अब कांग्रेस ने आगे की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस अब मुख्यमंत्री का फैसला चंडीगढ़ में करेगी। प्रदेश में चुनाव जीते तमाम विधायकों को चंडीगढ़ पहुंचने के आदेश जारी कर दिए गए हैं। कांग्रेस की यह बैठक शुक्रवार को चंडीगढ़ में होगी और यहीं मुख्यमंत्री के चेहरे पर सहमति बनाने का प्रयास किया जाएगा।
विधायकों के बीच सहमति बनाने के लिए इस बैठक में प्रदेश प्रभारी राजीव शुक्ला और चुनाव ऑब्जर्वर भूपेंद्र हुड्डा भी मौजूद रहेंगे। हालांकि कांग्रेस में फूट के खतरे को देखते हुए हिमाचल से बाहर जाने की बात कही जा रही थी, लेकिन प्रतिभा सिंह ने इसे खारिज कर दिया है।
प्रदेशाध्यक्ष ने कहा कि यह बैठक हिमाचल में भी हो सकती थी, लेकिन विधायकों की सहूलियत को देखते हुए इसे चड़ीगढ़ शिफ्ट किया गया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस 40 सीटें जीतकर सरकार बनाने जा रही है। ऐसे में पार्टी के भीतर किसी भी तरह का कोई खौफ नहीं है।
सभी विधायक एकजुटता के साथ मुख्यमंत्री का चयन करेंगे और इसके बाद हाईकमान की मंजूरी से मुख्यमंत्री की घोषणा कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि पार्टी में कोई फूट नहीं है। सभी विधायक पार्टी हाईकमान के फैसले पर अमल करेंगे। इस बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी मौजूद रहेंगे।

हर जिम्मेदारी निभाऊंगी

प्रतिभा सिंह ने कहा कि हाइकमान यदि उन्हें कोई जिम्मेदारी देती है, तो वे उसे निभाएंगी। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के महज दो महीने बाद उन्हें पार्टी ने मंडी के उपचुनाव में उतारा था और उन्होंने इस जिम्मेदारी मानते हुए निभाया भी। उन्होंने कहा कि होलीलॉज हमेशा से पार्टी के लिए निष्ठावान रहा है।
ऐसे में अब कोई भी फैसला लिया जाता है तो वे उसे स्वीकार करेंगी। उन्होंने इस बार विधानसभा चुनाव में जीत का श्रेय वीरभद्र सिंह को दिया। उन्होंने कहा कि भले ही वीरभद्र सिंह जनता के बीच नहीं थे, लेकिन उनके मन में उनकी छवि बरकरार थी।
कांग्रेस ने ओपीएस समेत घोषणापत्र में जो भी वादे किए हैं, उसे पूरा किया जाएगा। भाजपा की हार के लिए उन्होंने महंगाई और पुलिस भर्ती सहित बेरोजगारी को जिम्मेदार ठहराया है।

ओपीएस, महंगाई और बागी बने भाजपा के दुश्मन, पुलिस पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं के झगड़ों से भी नुकसान

हर बार की तरह इस बार भी हिमाचल प्रदेश में पांच साल बाद सत्ता बदलने का रिवाज कायम रहा। भाजपा ने दावा किया था कि इस बार पार्टी 37 साल से चले आ रहे रिवाज को बदलेगी, लेकिन ये संभव नहीं हुआ। जनता में इस समय सबसे अधिक चर्चा इसी बात की है कि भाजपा की लुटिया डूबी तो आखिर क्यों डूबी।
भाजपा की हार का मुख्य कारण कर्मचारियों का ओल्ड पेंशन स्कीम को लेकर आंदोलन रहा। उस आंदोलन को बाद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की सदन में गर्वोक्ति कि जिसे नेताओं वाली पेंशन चाहिए वो चुनाव लड़े, भी आम जनता को पसंद नहीं आई। भाजपा का टिकट वितरण भी जनता को नहीं पचा।
बागियों ने पार्टी का खेल बिगाड़ा। नालागढ़ से कांग्रेस से आए लखविंद्र राणा को टिकट दिया और अपने मजबूत प्रत्याशी केएल ठाकुर को दरकिनार किया गया। केएल ठाकुर चुनाव जीत गए हैं। पुलिस पेपर भर्ती लीक मामले में भी भाजपा की छीछालेदर हुई।
हालांकि भाजपा सरकार ने तुरंत पेपर रद्द कर नए सिरे से प्रक्रिया शुरू की, लेकिन पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। महंगाई एक अन्य मुद्दा रहा। पार्टी ने आंतरिक सर्वे में भी महंगाई को मुद्दा माना था।
इसके अलावा सत्ता विरोधी रुझान भाजपा की हार का बड़ा कारण रहा। ये सत्ता विरोधी रुझान ही था कि सरकार के सिर्फ दो ही मंत्री चुनाव जीत पाए। इस बार सुरेश भारद्वाज, वीरेंद्र कंवर, राजीव सैजल, रामलाल मार्कंडेय, सरवीण चौधरी, गोविंद ठाकुर, राकेश पठानिया, राजेंद्र गर्ग को हार का सामना करना पड़ा।
भाजपा की लाज काफी हद तक मंडी व चंबा जिला ने बचाई। मंडी में पार्टी को दस में से नौ सीटें मिल गई। चंबा में तीन सीटों पर जीत हासिल हुई। भाजपा को नए चेहरों ने जीत दिलाई। करसोग से दीपराज और आनी से लोकेंद्र का नाम इनमें प्रमुख है। खैर, हिमाचल में जिस समय भाजपा उपचुनाव में हारी थी, उस समय पार्टी के पास संभलने का मौका था।
भाजपा का दावा है कि वो 365 डेज चुनाव के मोड पर रहती है, जो सही भी है, लेकिन ऐसी सक्रियता का क्या लाभ जिसका परिणाम सफलता में तबदील न हो सके। तो उपचुनाव की हार के बाद भी पार्टी ने सबक नहीं सीखा। सरकार ने विभिन्न विभागों में भर्तियों के मामलों को उलझा कर रखा।
कुछ मामले कोर्ट तक पहुंचे। इस कारण बेरोजगार युवाओं में रोष था। अकसर ये आरोप लगते रहे कि मुख्यमंत्री की अफसरशाही पर पकड़ नहीं है। मुख्य सचिवों का बदलना भी इस आरोप का गवाह बना। अफसरशाही बेकाबू है और सीएम उसे संभाल नहीं पा रहे, ये आरोप विपक्ष अकसर लगाता रहा।

नालागढ़ से निर्दलीय विजेता

नालागढ़ में तो बागी ने चुनाव ही जीत लिया। किन्नौर सीट पर तेजवंत नेगी ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया तो ठियोग में इंदू वर्मा का फैक्टर भारी पड़ा। इंदू वर्मा टिकट की दावेदार थी, लेकिन पार्टी से पॉजिटिव संकेत न मिलने पर वे कांग्रेस में चली गई।
कांग्रेस में भी उन्हें टिकट नहीं मिला तो वे निर्दलीय मैदान में उतर गई। यदि इंदू का भाजपा का टिकट मिल जाता तो ठियोग में चांस बन सकते थे। ये भी अचरज की बात है कि भाजपा व कांग्रेस के वोट शेयर में कोई खास फर्क नहीं है, लेकिन मामूली फर्क ने ही सीटों में इतना अंतर ला दिया है।

निर्दलियों ने बिगाड़े पार्टियों के समीकरण, हमीरपुर सदर सीट के अलावा बड़सर-भोरंज में बने हार का कारण

जिला हमीरपुर की पांच विधानसभा सीटों में से तीन सीटों पर बतौर आजाद चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक पार्टियों के समीकरण इस बार बिगाड़ दिए। यूं कहें तो हमीरपुर सदर सीट के अलावा बड़सर और भोरंज में भाजपा की हार का कारण ही निर्दलीय प्रत्याशी रहे।
हमीरपुर को छोडक़र बड़सर और भोरंज में भले ही निर्दलीय न जीत पाए हों लेकिन उन्होंने भाजपा का खेल बिगाडऩे में अहम भूमिका अदा की। पार्टी ओवरकांफिडेंट थी और इन्हें शुरू से हल्के में ले रही थी जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा।
हमीरपुर सदर में निर्दलीय चुनाव लडऩे वाले आशीष शर्मा बीजेपी विचारधारा से रहे हैं। वे बीजेपी गो सेवा आयोग के सदस्य भी थे। हालांकि चुनावों के दौरान उन्होंने कुछ घंटों के लिए जरूर कांग्रेस का दामन थामा था लेकिन वहां उनकी जमी नहीं और आजाद चुनाव लड़ा।
नतीजा यह हुआ कि उन्होंने हमीरपुर में कांग्रेस और बीजेपी दोनों को ही पछाड़ दिया। उधर, बड़सर विधानसभा क्षेत्र में ही बतौर आजाद चुनाव लड़े बीजेपी विचारधारा से जुड़े संजीव शर्मा ने यहां पार्टी प्रत्याशी का समीकरण बिगाड़ा। हालांकि संजीव खुद तो जीत नहीं पाए लेकिन फिर भी उन्होंने 15252 वोट हासिल किए जो बीजेपी प्रत्याशी माया शर्मा के मतों से मात्र 1249 वोट कम हैं।
माया को 16501 मत पड़े थे। जबकि यहां से जीत हासिल करने वाले कांग्रेस प्रत्याशी को 30293 वोट हासिल हुए थे। ऐसे में कहीं न कहीं परिवारवाद और निर्दलीय की अनदेखी भाजपा के लिए भारी रही। दूसरा परिवारवाद और तीसरा बीजेपी प्रत्याशी डा. अनिल धीमान जीत को लेकर ओवरकोंफिडेंट नजर आ रहे थे।
चौथा बड़ा कारण यह कि यहां बीजेपी ने बतौर आजाद चुनाव लड़ रहे जिला परिषद सदस्य पवन कुमार को भी बड़े हल्के में लिया। हालांकि पवन को 6861 वोट ही मिले थे लेकिन भोरंज में कांग्रेस-भाजपा की जीत का अंतर भी तो सबसे कम 60 रहा है।
यहां कांग्रेस के सुरेश कुमार को 24779 जबकि भाजपा के डा. अनिल धीमान को 24719 मत पड़े थे। दो दर्जन के करीब और केंडिडेट भी विभिन्न दलों से लड़ रहे थे लेकिन इन तीन आजाद उम्मीदवारों द्वारा हासिल किए मतों को अधिक माना जा रहा है।

सबसे बुजुर्ग शांडिल, चैतन्य बने सबसे युवा विधायक, 14वीं विधानसभा में 28 से 82 वर्ष तक के विधायक

हिमाचल प्रदेश की चौदहवीं विधानसभा में सोलन विधानसभा क्षेत्र से कर्नल धनरीराम शांडिल सबसे बुजुर्ग विधायक होंगे। इनकी उम्र अभी 82 वर्ष है। इस बार के विधानसभा के चुनावों के लिए दावेदारी पेश करते समय उनके द्वारा पेश किए गए हल्फनामे में उनकी उम्र का जिक्र है। इसमें उन्होंने अपनी उम्र 82 वर्ष बताई हैं।
वहीं सबसे ज्यादा युवा विधायक भी कांग्रेस पार्टी से ही हैं। गगरेट विधानसभा क्षेत्र के चैतन्ये शर्मा इस विधानसभा में सबसे युवा विधायक हैं। इनकी उम्र 28 वर्ष हैं। कर्नल धनीराम शांडिल को तीसरी बार हिमाचल प्रदेश विधानसभा क्षेत्र में एंट्री मिली है।
सबसे पहले वर्ष 2012 में वह सोलन विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने थे, वर्ष 2017 में भी वह सोलन से ही विधायक बने। ऐसे में अब लगातार तीसरी बार उन्होंने हिमाचल प्रदेश विधानसभा में एंट्री मारी हैं। सोलन से भाजपा प्रत्याशी अपने ही दामाद राजेश कश्यप को हराकर विधायक बने हैं।
कर्नल धनीराम शांडिल ने राजेश कश्यप को 4858 मतों से मात दी है। हालांकि कर्नल धनीराम शांडिल सबसे अधिक उम्र के विधायक हैं, लेकिन इस बार की विधानसभा में विधायकों की औसत उम्र इस बार कम ही है।
ऐसा इसलिए क्योंकि भाजपा ने इस बार अधिक उम्र के प्रत्याशियों को दरकिनार कर दिया था और युवा प्रत्याशियों को मौका दिया गया था। इसमें सात बार के विधायक महेंद्र सिंह ठाकुर ने चुनाव नहीं लड़ा था। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने भी चुनाव लडऩे से इनकार कर दिया था।
कांग्रेस पार्टी से हालांकि कई वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव लड़ा था, लेकिन जनता ने उन्हें 14वीं विधानसभा में बतौर विधायक प्रवेश करने की अनुमति प्रदान नहीं की हैं। द्रंग से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कौल सिंह ठाकुर को हार का सामना करना पड़ा है। श्रीनयनादेवी से रामलाल ठाकुर को भी हार मिली है, जबकि डलहौजी विस क्षेत्र से आशा कुमारी को भी शिकस्त मिली है। (एचडीएम)

पहली बार एंट्री

ऊना के गगरेट विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के चैतन्य शर्मा सबसे विधायक हैं। इन्हें पहली बार विधानसभा में बतौर विधायक एंट्री मिली हैं। इन्होंने भाजपा के राजेश ठाकुर को भारी मतों से हराया है। करीब साढ़े 15 हजार वोटों से इन्होंने भाजपा प्रत्याशी को हार दी है। इससे पहले 13वीं विधानसभा में शिमला ग्रमाीण के विधायक विक्रमादित्य सिंह सबसे युवा विधायक बने थे।

हिमाचल के नतीजों ने बढ़ाया प्रियंका गांधी का कद, बतौर स्टार प्रचारक की थी पांच जनसभाएं

हिमाचल में कांग्रेस की जीत ने राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी के कद को बड़ा बना दिया है। प्रियंका गांधी ने हिमाचल में स्टार प्रचारक की भूमिका निभाई थी। अब जीत का श्रेय भी राष्ट्रीय स्तर पर उनके हिस्से आ रहा है। गुजरात में कांग्रेस को बड़ी हार देखनी पड़ी है, लेकिन यहां प्रियंका गांधी की खास भूमिका नहीं रही।
हिमाचल की बात करें तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने यहां की जनता से जो आध्यात्मिक और पारिवारिक रिश्ता कायम करने की कोशिश की थी वह बेहद कामयाब रहा।
प्रदेश की जनता ने कांग्रेस परिवार के साथ अपने भावनात्मक रिश्ते को न सिर्फ नई ऊर्जा प्रदान की है, बल्कि एक बार फिर से यह साबित किया है कि हिमाचल का रिवाज बरकरार है। प्रियंका गांधी ने अपनी जनसभाओं में कहा था कि वह अपनी दादी इंदिरा गांधी का सपना पूरा कर रही हैं।
उन्होंने सोलन, मंडी, कांगड़ा, ऊना और सिरमौर में पांच रैलियां की थीं। अपनी पहली ही रैली में प्रियंका गांधी ने जनता की नब्ज पकड़ी और ऐलान कर दिया कि सरकार बनते ही पहली ही कैबिनेट बैठक में पुरानी पेंशन बहाल होगी और एक लाख सरकारी नौकरियां दी जाएंगी एवं पांच साल में कुल पांच लाख रोजगार दिए जाएंगे।
महंगाई से निपटने के लिए हर महिला को 1500 रुपए महीने की आर्थिक मदद दी जाएगी। प्रियंका गांधी स्थानीय जनता की समस्याओं और हिमाचली जनता के हितों की बात पर टिकी रहीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा कह रही थी कि रिवाज बदल दीजिए और एक बार भाजपा, एक बार कांग्रेस की सरकार चुनने का फार्मूला त्यागकर फिर से भाजपा की सरकार बनाइए। वहीं, प्रियंका गांधी और कांग्रेस ने नारा दिया था, ‘हिमाचल का रिवाज जारी है, फिर से कांग्रेस आ रही है’।

इस बार भाजपा मुक्त हुआ सोलन जिला; बीजेपी के चारों खाने चित्त, टिकट आबंटन-भितरघात ने डुबोई लुटिया

सोलन जिला के पांचों निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा के चारों खाने चित्त होने के बाद इस बात पर मंथन चल पड़ा है कि टिकट आबंटन व भितरघात ने यहां विश्व की सबसे बड़ी पार्टी की लुटिया डुबोने में कहीं अहम रोल अदा तो नहीं कर दिया है।
पांच में से चार सीटों पर कांग्रेस ने परचम लहराया है तथा एक सीट निर्दलीय के खाते में गई है। रोचक पहलू यह है कि अर्की निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी बड़ी मुश्किल से अपनी जमानत बचाने में सफल हुए हैं।
यहां पर निर्दलीय प्रत्याशी राजेंद्र ठाकुर ने कांग्रेस के विजय प्रत्याशी संजय अवस्थी को बड़ी टक्कर देते हुए दूसरे स्थान पर रहकर सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाई है। सोलन से पूर्व सीडब्ल्यूसी मेंबर डा. धनीराम शांडिल ने यहां से लगातार तीसरी बार भाजपा प्रत्याशियों को हराकर हैट्रिक बनाई है।
डा. शांडिल ने पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के डा. राजेश कश्यप को 671 मतों से हराया था, किंतु इस बार जीत का अंतर बढक़र 3858 मतों का हो गया है। इस चुनाव में सबसे बड़ा उलटफेर कसौली निर्वाचन क्षेत्र में हुआ है। यहां से भाजपा में स्वास्थ्य मंत्री रह चुके डा. राजीव सहजल को करारी शिकस्त मिली है।
कसौली विधानसभा से कांग्रेसी प्रत्याशी विनोद सुल्तानपुरी ने डा. राजीव सहजल को 6683 मतों के भारी अंतर में हराकर पिछले दो चुनावों की हार का बदला भी ले लिया व शिमला सांसदीय क्षेत्र से छह बार सांसद रह चुके स्वर्गीय केडी सुल्तानपुरी के पुत्र हैं।
इसी तरह दून व नालागढ़ निर्वाचन क्षेत्रों में भी क्रमश: कांग्रेस व निर्दलीय प्रत्याशियों में जीत अर्जित करके सोलन जिला को भाजपा मुक्त कर दिया है। जिले में भाजपा की हार के पीछे जहां टिकट आबंटन में हुए गलत चयन को कारण बताया जा रहा है, वहीं सोलन अर्की में पार्टी में व्यापक स्तर पर हुए भितरघात से भी जोड़ा जा रहा है। अर्की में भाजपा का सुस्त प्रचार व प्रबंधन की बड़े स्तर पर कमी भी एक अहम कारण बताई जा रही है। (एचडीएम)

ससुर ने दामाद को दी पटखनी

सोलन निर्वाचन क्षेत्र में एक बार फिर ससुर ने दामाद को पटखनी दे दी। कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता डा. धनीराम शांडिल भाजपा के डा. राजेश कश्यप के ससुर हैं तथा पिछले व इस बार के चुनाव में उन्होंने दमाद को लगातार हराकर नई गाथा लिखी है।
डा. शांडिल को अपने गृह क्षेत्र ममलीग से भी लीड मिली तथा परंपरागत गढ़ नौणी क्षेत्र से भी वह बढ़त में ही रहे। डा. शांडिल के लिए चिंताजनक कंडाघाट क्षेत्र रहा तथा कंडाघाट से चायल तक भाजपा ने कड़ी टक्कर दी।

आरक्षित सीटों पर कांग्रेस का परचम, 20 में से 12 पर कब्जा, भाजपा के खाते में आठ सीटें

आरक्षित सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन इस बार दमदार रहा है। प्रदेश में 17 अनुसूचित जाति और तीन अनुसूचित जाति वर्ग की सीटों में से कांग्रेस ने 12 सीटें जीती हैं, जबकि भाजपा के खाते में आठ ही सीटें इस बार आई हैं।
कांग्रेस ने जिन सीटों को जीता है, उनमें इंदौरा में मलेंद्र राजन ने 2250 मतों से, जयसिंहपुर में कांग्रेस के यादविंद्र गोमा ने 2696 मतों से चुनाव जीते हैं।
बैजनाथ में कांग्रेस के किशोरी लाल ने 3446 मतों से, भोरंज में कांग्रेस के सुरेश कुमार ने बेहद नजदीकी मामले में 70 मतों से चुनाव जीता, चिंतपूर्णी में सुदर्शन सिंह बबलू 4858 मतों से, सोलन में कर्नल धनीराम शांडिल 3858 मतों से चुनाव जीते हैं, जबकि कसौली में विनोद सुल्तानपुरी 6768 मतों से, रेणुकाजी से कांग्रेस के विनय कुमार 860 मतों से, रामपुर में कांग्रेस के नंद लाल 567, तो रोहड़ू में कांग्रेस के मोहन लाल ब्राक्टा 19339 मतों से चुनाव जीत गए हैं, जबकि अनुसूचित जनजाति वर्ग की तीन में से दो सीटें कांग्रेस के खाते में आई हैं।
इनमें किन्नौर में जगत सिंह नेगी 6964 मतों से जीत दर्ज करने में कामयाब रहे हैं। लाहुल-स्पीति में कांग्रेस के रवि ठाकुर 1616 मतों से चुनाव जीते हैं। जबकि भरमौर की सीट पर भाजपा के डा. जनक 5162 मतों से चुनाव जीतने में कामयाब हुए हैं।
आरक्षित सीटों पर भाजपा के प्रदर्शन की बात करें, तो आनी में भाजपा के लोकेंद्र कुमार ने 5162 मतों से, नाचन में भाजपा के विनोद कुमार 8956 मतों से चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं।
बल्ह में इंद्र सिंह 1487 मतों से चुनाव जीते हैं, जबकि पच्छाद में भाजपा की रीना कश्यप 3857 मतों से, जबकि करसोग में दीप राज 10 हजार 534 मतों से चुनाव जीतने में कामयाब हो गए हैं।

रिवाज नहीं बदला

बनते बिगड़ते काफिले, सत्ता का गठजोड़ करते नए मुहावरे और मत की पेचीदगियों के नए आंकड़े मुखातिब हैं, जहां टूटते आभामंडल, बुने गए नए समीकरण, अपनी कहानियां बदल रहे हैं। काबिलीयत के कई दर्पण टूटे और कहीं मुरझा गए सत्ता के बागीचे।
हिमाचल के लुढक़े मंत्री अपनी दास्तान बता रहे और कहीं भाजपा का संगठन खुद को मिली इस हार से पछता रहा है। अंतत: रिवाज बदलने का मंतव्य हिमाचल ने मंजूर नहीं किया और यह भी बता दिया कि इस प्रदेश में लोक को किसी भी प्रकार का तंत्र कभी नहीं लूट पाएगा।
इसलिए इस जीत-हार में जनता का पक्ष, संदेश और संवेदना स्पष्ट तौर पर परिवर्तन की गवाही दे गई। हिमाचल की जनता ने बड़ी शिद्दत से लोकतंत्र का तराजू 40 सीटें देकर कांग्रेस की ओर झुकाया, तो बतौर सशक्त विपक्ष भाजपा के हिस्से में 25 सीटें लिख दीं। ऐसे में मतदाता ने फिर राजनीतिक नाखुन छीलने और अहंकार छीनने का काम किया।
उम्मीदों के नए पांव चलती कसौटियों ने तंबू उखाडक़र, नई जगह-नया सवेरा उकेरा है, तो चुनाव परिणाम के सबक भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस के लिए भी हैं। चुनाव परिणामों ने कई बंधक परिपाटियों को तोड़ते हुए अंतिम पारियां भी लिखी हैं।
ठाकुर कौल सिंह, डा. राजन सुशांत, रविंद्र सिंह रवि, रमेश धवाला, और सरवीण चौधरी सरीखे नेताओं के लिए यह चुनाव उनकी सियासी ढलान का अंतिम छोर साबित हुआ, तो महेंद्र सिंह के लिए परिवार को आगे बढ़ाने का आखिरी पड़ाव बना।
कांग्रेस शुक्र मना सकती है कि आम आदमी पार्टी चुनाव के बीच फुर्र हो गई, वरना पांच से सात प्रतिशत उसके खाते के मत घातक हो सकते थे। कांग्रेस से भाजपा में जा मिले पवन काजल और अनिल शर्मा के लिए अपनी जीत का ढिंढोरा पलट कर जब कांग्रेस सरकार का अस्तित्व देखेगा, तो आह जरूर निकलेगी।
निकलेगी आहों की राह पर जब भाजपा, तो उसे आत्मचिंतन में हार के कारण ढंूढने होंगे। डबल इंजन के परिश्रम और प्रश्रय में ऐसी क्या खामी रही कि बार-बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हिमाचल आगमन भी गुजरात जैसा माहौल नहीं बना पाया।
यहां प्रियंका फैक्टर का असर कांग्रेस को कबूल करना होगा, क्योंकि पार्टी के लिए मुद्दों की फेहरिस्त बनाने में उनकी जनसभाएं जरूर कारगर सिद्ध हुईं। रणनीतिक तौर पर भाजपा की संगठनात्मक ताकत का ही प्रतिफल है कि कांग्रेस तमाम समर्थन के बावजूद एकतरफा जीत हासिल नहीं कर पाई, फिर भी इस जीत में कांग्रेस को सबसे बड़ा राजनीतिक एहसास छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अनुभवी बिसात पर हासिल हुआ है।
चुनाव परिणाम ने उन मुद्दों की काफी हद तक हवा निकाली, जिन्हें उठाकर कांग्रेस चल रही थी। मसलन अग्रिवीर नीति या ओपीएस विवाद पर अगर हिमाचल एकतरफा सोचता, तो कांग्रेस का आंकड़ा किसी शिखर पर होता। यह दीगर है कि सुशासन, सरकार का प्रदर्शन और अंसतुलित विकास से निकला क्षेत्रवाद आईना दिखा रहा है।
मंडी, कांगड़ा, शिमला के अलावा हमीरपुर और चंबा का मूड बता रहा है कि सरकार की नीयत में कहां खोट और कहां झुकाव रहा। बेशक उपचुनावों में मिली हार को ढांपने के लिए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मंडी में खंभ ठोंका और जिसके नतीजे सामने हैं।
करीब 37 हजार वोटों से जीत हासिल करके मुख्यमंत्री ने अपनी लोकप्रियता का सिराज तो बना लिया, लेकिन वह सत्ता का ताज बनाने वाले कांगड़ा को नहीं बचा पाए। जिस तरह भाजपा सरकार में मंत्रियों के विभागीय आबंटन में कांगड़ा के बजटीय प्रावधान हारते रहे, उसका चुनावी कचूमर कांगड़ा व हमीरपुर में देखने को मिल रहा है।
दूसरी ओर कांग्रेस की जीत दरअसल हिमाचल की जनता की जीत या भाजपा की हार है, वरना जिस पार्टी में मुख्यमंत्री पद की लड़ाई में टिकटों का आबंटन हुआ, उसका पथराव सामने है। सुलाह से जगजीवन पाल से टिकट छीनना महंगा पड़ा।
जिस तरह ज्वालामुखी,जयसिंहपुर व धर्मशाला से संजय रतन, यादविंदर गोमा तथा सुधीर शर्मा को अंत में टिकट मिले और उन्होंने जीत हासिल की, यह साबित करती है कि कांग्रेस अपना शिकार खुद भी करना जानती है। प्रदेश में सत्ता की अदला बदली एक सत्य है, तो यह भी सच है कि कांगड़ा हमेशा सरकार बनाने के श्रम में सबसे अव्वल रहता है।
यह गलती अतीत में प्रेम कुमार धूमल से हुई तो इस बार जयराम ठाकुर भी अपनी सत्ता में कांगड़ा की भागीदारी को न्याय नहीं दे पाए। अंत में भाजपा की हार के ठीकरे मुख्यमंत्री से कहीं अधिक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा, हिमाचल भाजपा के संगठन मंत्री पवन राणा और संघ परिवार के उस वर्चस्व को उठाने पड़ेंगे, जिन्होंने सरकार के हर ओहदे में अपना-अपना रंग जमाया। (एचडीएम)

मुख्यमंत्री के तीन चेहरे हारे, अब छह में मुकाबला

कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भले ही फायदा हुआ हो, लेकिन पार्टी में मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे नेताओं की हार ने उनके समर्थकों का दिल जरूर तोड़ा है। विधानसभा चुनाव की शुरूआत के साथ ही कांग्रेस में करीब आठ नेता सीएम फेस की रेस में थे। इनमें से कौल सिंह ठाकुर, रामलाल ठाकुर और आशा कुमारी चुनाव हार गए हैं।
कौल सिंह ठाकुर को सबसे सीनियर होने का फायदा मिलने की संभावना इस बार के विधानसभा चुनाव में थी। लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाएगा। सीएम फेस के जो नेता अब मैदान में बचे हैं उनमें नादौन से सुखविंद्र सिंह सुक्खू, हरोली से मुकेश अग्रिहोत्री, कांगड़ा से चंद्र कुमार, शिलाई से हर्षबर्धन सिंह चौहान और सोलन से कर्नल धनी राम शांडिल का नाम प्रमुख है।
हालांकि प्रदेशाध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने खुद को मुख्यमंत्री पद की दौड़ से अलग नहीं किया है। उन्होंने होलीलॉज को प्रतिनिधित्व देने का फैसला हाईकमान पर छोड़ दिया है। प्रतिभा सिंह को कांग्रेस मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करती है तो उन्हें आगामी छह महीने में विधानसभा का चुनाव लडऩा होगा और इसके लिए किसी कांग्रेस नेता को अपनी सीट खाली करनी पड़ेगी।
ऐसी स्थिति में हिमाचल में एक विधानसभा और मंडी लोकसभा सीट पर उपचुनाव होंगे। कांग्रेस में अन्य नेताओं की बात करें तो सुखविंद्र सिंह सुक्खू इस पद के सबसे बड़े दावेदार हैं।
सुक्खू प्रचार समिति के अध्यक्ष रहें हैं और उन्होंने प्रदेश में चहेते नेताओं को टिकट दिलवाने में अहम भूमिका अदा की थी। इसके अलावा प्रदेशाध्यक्ष के सीएम दावेदार न होने की शर्त भी उनके पक्ष में जाएगी।
जबकि मुकेश अग्रिहोत्री बीते पांच साल तक नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में थे। हालांकि उन्होंने अपने पत्ते पूरी तरह साफ नहीं किए हैं। लेकिन दिल्ली दरबार में हुई बैठकों में मुकेश अग्रिहोत्री के नाम पर चर्चा जरूर सुनने को मिलती रही है। कांग्रेस की इस सूची में सोलन से कर्नल धनी राम शांडिल भी शामिल हैं।
प्रदेश प्रभारी राजीव शुक्ला ने शुरूआत में हिमाचल में तीन नेताओं की टीम बनाई थी। इस टीम में प्रदेशाध्यक्ष प्रतिभा सिंह, नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्रिहोत्री के साथ ही प्रचार समिति के अध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू को शामिल किया गया था। लेकिन इसके बाद चौथा नाम कर्नल धनी राम शांडिल का जोड़ा गया और इसमें उन्हें चुनाव घोषणापत्र की जिम्मेदारी दी गई थी।
कांग्रेस के एक और बड़े नेता हर्षवर्धन चौहान चुनाव जीतने में कामयाब हुए हैं। वे भी बीते पांच साल तक उप नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाते रहे हैं। इन सबके अलावा एक अन्य नाम कांगड़ा जिला से चंद्र कुमार का भी है। चंद्रकुमार कांगड़ा में कांग्रेस के ओबीसी चेहरा हैं और इस बार कांगड़ा से कांग्रेस को बड़ा बहुमत भी मिला है। बहरहाल, कांग्रेस के लिए मुख्यमंत्री के फैसले का रास्ता आसान नहीं है।

24 महिला प्रत्याशियों में से सिर्फ एक जीती

हिमाचल विधानसभा चुनाव में इस बार कांग्रेस ने अपना परचम लहराया है। भाजपा सरकार में मंत्री रहे नौ नेता भी अपनी सीट नहीं बचा पाए, लेकिन इसमें सबसे खास बात यह है कि इस बार हिमाचल की महिला नेत्रियों पर भी ज्यादा भरोसा नहीं जताया है।
24 विधानसभा क्षेत्रों से अलग-अलग पार्टियों ने 24 महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था, जिसमें से केवल एक सीट पर ही महिला नेत्री साख बचा पाई है। इसमें पच्छाद से भाजपा की प्रत्याशी रही रीना कश्यप ने 3857 वोटों से अपनी जीत दर्ज की।
उन्होंने कांग्रेस की प्रत्याशी दयाल प्यारी को इसके साथ वर्तमान सरकार में कैबिनेट मंत्री रही सरवीण चौधरी भी शाहपुर से नहीं जीत पाईं। कुल वोट प्रतिशतता की बात करें, तो हर विधानसभा क्षेत्रों मतदाताओं का खासा रूझान देखने को मिला था।
इसमें पच्छाद और चंबा दो ऐसे विधानसभा क्षेत्र थे, जहां भाजपा और कांग्रेस से दो महिला प्रत्याशी आमने -सामने थे लेकिन जीत केवल पच्छाद विधानसभा क्षेत्र की झोली में गई है।
पिछली बार केवल 19 महिलाएं ही चुनाव में थीं, लेकिन इस बार 24 महिला प्रत्याशियों को यह मौका दिया गया था। वहीं डलहौजी से कांग्रेस की वरिष्ठ महिला नेत्री आशा कुमारी को भी इस बार हार का सामना करना पड़ा।
ठियोग से निर्दलीय चुनाव लड़ रही इंदु वर्मा भी इस बार जीत दर्ज नहीं कर सकी। वहीं, मंडी से कांग्रेस की चंपा ठाकुर भी हार का सामना करना पड़ा। पिछली बार के विधानसभा चुनाव में तीन महिला नेत्रियों ने अपनी जीत दर्ज की थी। कांग्रेस और भाजपा के अलावा अन्य पार्टियों में अधिकतर सीटों पर महिला नेत्रियों की जमानत भी जब्त हुई है।
इस बार ये महिला नेत्रियां थीं मैदान में
  • विस क्षेत्र महिला प्रत्याशी
  • इंदौरा रीता धीमान
  • पच्छाद रीना कश्यप, दयाल प्यारी
  • शाहपुर सरवीण चौधरी
  • चंबा नीलम नैयर, इंदिरा कपूर
  • बड़सर माया शर्मा
  • रोहडू़ शशिबाला
  • मंडी चंपा ठाकुर
  • डलहौजी आशा कुमारी
  • ठियोग इंदु वर्मा नुरपूर मनीषा कुमारी
  • नाचन जबना चौहान
  • भोरंज रजनी कौशल
  • सोलन अंजू राठौर
  • पावंटा सीमा
  • भरमौर पूजा
  • भटियात अमृता चौधरी सुंदरनगर पूजा वर्मा
  • सराज इंदिरा देवी
  • बिलासपुर लता चंदेल, पूजा पाल
  • सुलाह रेखा रानी
  • जुब्ब्ल सुमन कदम

मनाली में कांगे्रस का सूखा खत्म

मनाली में कांग्रेस की एकजुटता ने मनाली विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस का 15 वर्षों से सूखा खत्म कर डाला है। पिछले 15 वर्षो से जीत की तलाश कर रही कांग्रेस को आखिरकार एकता में बल की नीति की काम आई है। मनाली की हॉट सीट से चुनाव लड़ रहे कैबिनेट मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर जीत का चौका लगाने में पिछड़ गए हैं।
यहां पर उन्हें कांग्रेस के प्रत्याशी भुवनेश्वर गौड़ ने 2957 वोटों से हराकर पहली दफा अपना विधानसभा जाने का रास्ता बनाया है। कैबिनेट मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर को यहां पर ेसत्ता विरोधी लहर का भी सामना करना पड़ा है। हालांकि भाजपा के बागी आजाद प्रत्याशी का भी कोई खास असर भाजपा प्रत्याशी के मत पर नहीं पड़ा है।
कुल्लू सदर में भाजपा का खेल बागी प्रत्याशी राम सिंह ने बिगाड़ा है। कुल्लू सदर से कांग्रेस के प्रत्याशी सुंदर सिंह ठाकुर दूसरी बार विधानसभा पहुंचने में कामयाब हुए हैं। सुंदर सिंह ठाकुर ने भाजपा के प्रत्याशी नरोत्तम ठाकुर को 4103 मतों से हराया है। यहां पर रोचक यह है कि सुंदर सिंह ठाकुर को 30286, नरोत्तम ठाकुर को 26183 और भाजपा के बागी राम सिंह को 11937 वोट लेने में कामयाब हुए हैंं।
अगर यहां पर भाजपा एक जुट होती, तो शायद भाजपा के प्रत्याशी को कहीं न कहीं मजबूती मिलती। वहीं बंजार से सुरेंद्र शौरी दूसरी बार विधानसभा पहुंचने में कामयाब हुए हैं। उन्हें भी अपने गृह क्षेत्र खूब बढ़त मिली। सुरेंद्र शौरी ने यहां 4334 मतों से कांग्रेस प्रत्याशी खीमी राम शर्मा को हराया है।
यहां पर भी आजाद प्रत्याशी हितेश्वर सिंह 14932 वोट ले जाने में कामयाब जरूर रहे हैं। आनी विधानसभा क्षेत्र से भी शुरुआती दौर से आजाद कांग्रेस के प्रत्याशी की जीत को लेकर चर्चा बनी रही। हालांकि आजाद प्रत्याशी परस राम यहां दूसरे स्थान पर रहे हैं, लेकिन चुनाव परिणाम वाले दिन जिस तरह से भाजपा के प्रत्याशी लोकेंद्र कुमार के पक्ष में जैसे ही मतदान आने शुरू हुए, तो शुरुआती दौर से लेकर अंत तक वह बढ़त बनाते रहे।
यहां भाजपा के प्रत्याशी ने लोकेंद्र कुमार ने 6778 जीत दर्ज की है। लोकेंद्र कुमार को 24183 मत पड़े हैं, जबकि आजाद प्रत्याशी परस राम ने 17355 मतदान हासिल किए। ऐेसे मे जिला कुल्लू में चार विधानसभा क्षेत्र में दो-दो उम्मीदवार की जीत बड़े राजनीतिक पार्टियों ने अपनी झोली में डाली है। (एचडीएम)

कांग्रेस के सिर पर कांगड़ा का ‘हाथ’

प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा की जनता ने कांगे्रस को बड़ा जनादेश दिया है। कांगड़ा में सबसे अधिक 15 सीटों वाले जिला में कांगे्रस ने 10 सीटों पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वहीं, सत्ताधारी दल भाजपा को महज चार सीटों के साथ संतोष करना पड़ा है। एक बार फिर देहरा विधानसभा क्षेत्र से आजाद प्रत्याशी होशियार सिंह ने जीत दर्ज की है।
(एचडीएम)
फिर दोहराया इतिहास
नूरपुर : भाजपा प्रत्याशी रणबीर सिंह निक्का ने कांगे्रस उम्मीदवार अजय महाजन को 18752 मतों से हराया
इंदौरा : कांगे्रस प्रत्याशी मलेंद्र राजन ने भाजपा नेत्री रीता धीमान को 2250 मतों से मात दी
फतेहपुर : कांगे्रस के भवानी सिंह पठानिया ने भाजपा के मंत्री राकेश पठानिया को 7354 मतों से हराया
जवाली : कांगे्रस के चंद्र कुमार ने भाजपा के संजय गुलेरिया को 3031 मतों से हराया
देहरा : आजाद उम्मीदवार होशियार सिंह ने कांगे्रस लीडर डा. राजेश शर्मा को 3877 मतों से शिकस्त दी
जसवां परागपुर : भाजपा प्रत्याशी विक्रम सिंह ने कांगे्रस नेता सुरिंद्र सिंह मनकोटिया को 1789 मतों से हराया
ज्वालामुखी : कांगे्रस के संजय रतन ने भाजपा के रविंद्र सिंह रवि को 6404 मतों से पराजित किया
जयसिंहपुर : कांगे्रस के यादविंद्र गोमा ने भाजपा के रविंद्र धीमान को 2696 मतों से पराजित किया
सुलाह : भाजपा के विपिन परमार ने आजाद प्रत्याशी जगजीवन पाल को 6802 मतों से हराया
नगरोटा : कांग्रेस नेता आरएस बाली ने भाजपा के अरुण कुमार को 15892 मतों से पराजित किया
कांगड़ा : भाजपा प्रत्याशी पवन कुमार काजल ने कांगे्रस नेता सुरेंद्र काकू को 19834 मतों से हराया
शाहपुर : कांगे्रस के केवल पठानिया ने भाजपा नेत्री सरवीण चौधरी को 12243 मतों से पराजित किया
धर्मशाला : कांगे्रस प्रत्याशी सुधीर शर्मा ने भाजपा के राकेश चौधरी को 3285 मतों से पराजित किया
पालमपुर : कांगे्रस प्रत्याशी आशीष बुटेल ने भाजपा के त्रिलोक कपूर को 5328 मतों से हराया
बैजनाथ : कांगे्रस प्रत्याशी किशोरी लाल ने भाजपा के मुलखराज प्रेमी को 3446 मतों से शिकस्त दी

जयराम ठाकुर ने दिया इस्तीफा, कांग्रेस को बधाई

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। राज्यपाल ने इसे स्वीकार करते हुए मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार, हिमाचल प्रदेश विधानसभा को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है।
उन्होंने जयराम ठाकुर के नेतृत्व वाली राज्य की वर्तमान सरकार से अनुरोध किया है कि वह पद पर बने रहें और अपने कार्यों का निर्वहन तब तक करें, जब तक कि नई विधानसभा का गठन न हो जाए और नई सरकार न बन जाए। इस संबंध में राजभवन से अधिसूचना जारी कर दी गई है।
उधर, अपने सरकारी निवास ओकओवर में मीडिया से जयराम ठाकुर ने कहा कि वह जनादेश का सम्मान करते हैं। उन्होंने नई सरकार को शुभकामनाएं दीं, लेकिन इसके साथ कांग्रेस को एक नसीहत भी दी।
जोड़-तोड़ से सरकार बनाने की कोशिश पर जयराम ठाकुर ने कहा कि यह बेतुकी बातें हैं और ऐसा कुछ नहीं होने वाला। कांग्रेस को भाजपा के बजाय खुद से ही डरना चाहिए। जयराम ठाकुर ने कहा की हार के कारणों की समीक्षा की जाएगी और इस बारे में पार्टी हाईकमान से भी चर्चा होगी।
वह तुरंत निष्कर्ष पर नहीं जाएंगे, क्योंकि हार के बहुत से कारण होते हैं। हालांकि उन्होंने यह कहा कि बागियों के चुनाव में उतरने के कारण नुकसान हुआ है। तीसरे विकल्प को लेकर पूछे गए सवाल पर जयराम ठाकुर ने कहा कि हिमाचल में आम आदमी पार्टी का कोई भविष्य नहीं है और यदि इनकी कोई प्रेजेंस होती तो उसका लाभ मिलना था।

जीत का नया रिकार्ड बना गए जयराम ठाकुर

शिमला, मंडी। विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सर्वाधिक वोट से जीत का एक नया रिकार्ड बना दिया है। सिराज विधानसभा क्षेत्र में कुल पड़े 70752 वोट में से 53562 वोट जयराम ठाकुर को मिले, जो कुल वोट का 75 फीसदी है।
इनके प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस प्रत्याशी चेतराम को 15379 वोट ही मिल पाए। इस तरह जयराम ठाकुर ने यह चुनाव 38183 वोट से जीता। इससे पहले दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के वोट का अंतर पहले से रिकॉर्डिड है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह 1998 के विधानसभा चुनाव में रोहडू सीट से 26148 वोट से जीते थे।
इसके बाद 2007 के विधानसभा चुनाव में हमीरपुर जिला की बमसन सीट से पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल 26007 वोट से जीते थे।

नादौन में दूसरी बार कांग्रेस की जीत

विधानसभा क्षेत्र नादौन से कांग्रेस प्रत्याशी ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने लगातार दूसरी बार जीत का परचम लहराया है। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को 3363 मतों पछाड़ा। कांग्रेस प्रत्याशी ने मतगणना के शुरूआत रूझानों में ही बढ़त बना ली है।
यह बढ़त लगातार बनी रही और अंत में जीत में तबदील हो गई। नादौन विधानसभा के 121 बूथों में से अधिकांश पर कांग्रेस उम्मीदवार सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने पहले से ही चार हजार मतों की महत्त्वपूर्ण बढ़त बना ली थी जो कि सातवें राउंड में जाकर थोड़ा कम हुई।
भाजपा प्रत्याशी विजय अग्निहोत्री इतनी बढ़त नहीं ले सके कि कांग्रेस की लीड को कम कर सकें। 12वें राउंड तक भी सुक्खू करीब चार हजार की बढ़ते बनाए हुए थे। अंत के चार राउंड में भाजपा की स्थिति कुछ सुधरी परंतु वह कांग्रेस की पिछली लीड को नहीं तोड़ पाई।
इसमें पोस्टल बैलेट में से 825 भाजपा के पक्ष में तो 1131 मत कांग्रेस के पक्ष में रहे। नादौन में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी शैंकी ठुकराल को 1487 मतों से संतोष करना पड़ा। बहुजन समाज पार्टी के देशराज को 225 मत पड़े जबकि आजाद उम्मीदवार रणजीत सिंह को 116 व सुरेंद्र कुमार को 98 मत प्राप्त हुए। नोटा का बटन 192 लोगों ने दबाया है। (एचडीएम)

रियलमी का 10प्रो सीरीज 5जी स्मार्टफोन जियो के 5जी नेटवर्क को करेगा सपोर्ट

नई दिल्ली – स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनी रियलमी ने आज अपना नया 5जी स्मार्टफोन लॉन्च किया जो जियो के 5 जी नेटवर्क को सपोर्ट करेगा। फ्लैगशिप फोन किलर -10प्रो सीरीज के इस फोन की कीमत 17,999 रुपये से शुरू होगी। कंपनी ने कहा कि वह रिलायंस जियो के साथ मिलकर कई नए बंडल ऑफर ले कर आएगी।
स्मार्टफोन की सेल 14 दिसंबर से शुरू होगी। लॉन्च पर टिप्पणी करते हुए रियलमी इंडिया के सीईओ माधव शेठ ने कहा “ रियलमी ने 5जी स्टैंडअलोन, एनआरसीए, वीओएनआर जैसी तकनीकों के लिए जियो के साथ हाथ मिलाया है।
इसके साथ ही ग्राहकों को ट्रू 5जी एक्सपीरियंस देने के लिए जियो के साथ साझेदारी में रियलमी अपने चुनिंदा शोरूम में ट्रू 5जी एक्सपीरियंस जोन भी स्थापित करेगा।”
जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड के सीईओ किरण थॉमस ने इस साझेदारी पर कहा “हम रियलमी के साथ एक और बेहतरीन साझेदारी करके बेहद उत्साहित हैं। रियलमी 10 प्रो प्लस जैसे शक्तिशाली 5जी स्मार्टफोन की वास्तविक ताकत को जियो जैसे ट्रू 5जी नेटवर्क द्वारा ही दिखाया जा सकता है। जियो ट्रू 5जी भारत के साथ दुनिया का सबसे उन्नत नेटवर्क है।”
रियलमी 10 प्रो प्लस 5जी, फ्लैगशिप-लेवल के 120 हर्टज कर्व्ड विज़न डिस्प्ले से लैस है और अपने सेगमेंट का पहला स्मार्टफोन है। रियलमी 10 प्रो प्लस 5जी अल्ट्रा-लाइट बॉडी के साथ आकर्षक हाइपरस्पेस डिज़ाइन में आता है।
वजन में हल्के इस स्मार्टपोन का कुल भार महज 173 ग्राम है, साथ ही स्मार्टफोन में 5000एमएएच की बैटरी है जो लंबे समय तक साथ देने के लिए बनी है। फोटोग्राफी के दिवानों के लिए इसमें फ्लैगशिप मोबाइल फोन स्तर का 108एमपी प्रोलाइट कैमरा लगा है।

लखनपाल रहे ‘मैन ऑफ दि मैच’

हमीरपुर में चुनावी नतीजों में कांग्रेस प्रत्याशी की सबसे अधिक 13792 मतों से लीड; निर्दलीय प्रत्याशी आशीष शर्मा 12899 मतों से चुनाव जीते, सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने अग्निहोत्री को 3363 मतों से हराया, 399 मतों से जीतकर राणा चौथे तो 60 वोटों से जीतकर सुरेश पांचवें स्थान पर

नीलकांत भारद्वाज-हमीरपुर

विधानसभा चुनावों के नतीजे गुरुवार को घोषित कर दिए गए। वर्ष 2017 के चुनावों में मात्र 439 वोटों से जीत हासिल करने वाले बड़सर से कांग्रेस के विधायक इंद्रदत्त लखनपाल इन चुनावों में मैन ऑफ दि मैच साबित हुए। जिला के पांचों विधानसभा क्षेत्रों में उन्होंने सबसे अधिक लीड हासिल की।
इंद्रदत्त लखनपाल को इस बार कुल 30293 वोट पड़े। उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी माया शर्मा को 13792 मतों से हराया। माया शर्मा को 16501 मत पड़े। बड़ी जीत हासिल करने वालों में दूसरा स्थान हमीरपुर सदर से आजाद प्रत्याशी आशीष शर्मा का रहा।
आशीष शर्मा को 25916 वोट पड़े। उन्होंने कांग्रेस के डा. पुष्पेंद्र वर्मा को 12899 मतों से हराया। जीत हासिल करने वालों में तीसरा स्थान नादौन से कांग्रेस प्रत्याशी सुखविंद्र सिंह सुक्खू का रहा। सुखविंद्र सिंह सुक्खू को कुल 36142 वोट पड़े। उन्होंने बीजेपी के विजय अग्निहोत्री को 3363 मतों से हराया।
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों में सुक्खू ने अग्निहोत्री को 2203 मतों से परास्त किया था। हमीरपुर में जीत हासिल करने वाले चौथे नंबर पर सुजानपुर से कांग्रेस के विधायक राजेंद्र राणा रहे। राजेंद्र राणा को कुल 27679 मत पड़े। उन्होंने भाजपा के कैप्टर रंजीत सिंह राणा को 399 मतों से हराया। कै. रंजीत राणा को 27280 वोट पड़े।
जिले में जीत का सबसे कम मार्जिन भोरंज विधानसभा क्षेत्र में रहा। यहां जीते कांग्रेस के सुरेश कुमार को 24779 वोट पड़े जबकि बीजेपी के डा. अनिल धीमान 24719 वोट पड़े। सुरेश कुमार मात्र 60 मतों से विजयी हुए हैं। हालांकि भोरंज में कांग्रेस की जीत को बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि 35 वर्ष के इतिहास में यह पहला मौका है जब यहां कांग्रेस ने जीत हासिल की है। (एचडीएम)

भोरंज में 35 साल बाद भाजपा का किला ध्वसत

भाजपा का गढ़ बन चुकी भोरंज विधानसभा क्षेत्र की सीट पर इस बार बड़ा फेरबदल हो गया है। लगभग 35 साल बाद कांग्रेस ने भाजपा के किले को ध्वस्त करने में बड़ी कामयाबी हासिल की है। हालांकि जीत महज 60 मतों से ही मिली लेकिन इसे कांग्रेस की बड़ी अचीवमेंट माना जा रहा है।
बड़ी कामयाबी भी क्यों न मानी जाए, इस सीट को जीतने के लिए कांग्रेस वर्षाे से जी जान लगाए हुए है। हर विस चुनावों में निराशा ही हाथ लग रही थी, लेकिन इस बार ओपीएस के फेक्टर ने काम कर दिया। वहीं भोरंज से निर्दलीय प्रत्याशी ने भी कहीं न कही भाजपा का ही नुकसान पहुंचाया। भीतरघात की बातें भी यहां से सामने आ रही हैं। खैर जो भी हो इस बार कांग्रेस ने भोरंज में भाजपा के तलिस्म को तोडऩे में कामयाबी हासिल कर ली है।
भोरंज विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस प्रत्याशी सुरेश कुमार व भाजपा प्रत्याशी डा. अनिल धीमान की कांटे की टक्कर रही। सुरेश कुमार ने भाजपा प्रत्याशी डा. अनिल धीमान को कड़े संघर्ष में 60 वोटों से हराया। इसमें सुरेश कुमार को 24779 वोट मिले तथा बीजेपी प्रत्याशी डा. अनिल धीमान को 24719 मत प्राप्त हुए।
बसपा के जरनैल सिंह को 302, आप की रजनी कौशल को 463, निर्दलीय पवन कुमार को 6861 तथा नोटा को 293 मत पड़े। भोरंज के मतगणना केंद्र भोरंज स्कूल में कांग्रेस प्रत्याशी सुरेश कुमार के जीतने पर भोरंज निर्वाचन अधिकारी कुमारी स्वाति डोगरा ने इलेक्शन कमीशन की ओर से जीत का प्रमाण पत्र दिया।
इसके उपरांत सुरेश कुमार ने सभी समर्थकों सहित स्कूल ग्राउंड के प्रांगण में पहुंचकर यहां उपस्थित कांग्रेस कार्यकर्ताओं का अभिवादन किया। पूरे भोरंज क्षेत्र सुरेश कुमार के पक्ष में लगे नारों से गंूज उठा। वहीं भोरंज ब्लॉक अध्यक्ष विजय बन्याल ने सभी युवाओं, महिला शक्ति व बुजुर्गों का साथ देने के लिए धन्यवाद किया। (एचडीएम)

राजनीति में बदले की भावना नहीं, सेवा भाव चाहिए

राजनीति में बदले की भावना नहीं सेवा का भाव होना चाहिए। यही मेरी जीत का मूल मंत्र है। कार्यकर्ताओं ने अपना चुनाव समझकर यह चुनाव लड़ा है, यह मेरी जीत नहीं सुजानपुर विधानसभा क्षेत्र के प्रत्येक मतदाता की जीत है प्रत्येक पार्टी वर्कर की जीत है।
यह बात चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस प्रत्याशी राजेंद्र राणा ने जनता को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि केंद्रीय मंत्री खुद व धूमल परिवार गली-गली घूमकर अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांगता रहे, लेकिन सुजानपुर की जनता ने एक बार फिर से दिखा दिया है कि यहां बदले की भावना से काम करने वाले को कोई जगह नहीं। उन्होंने कहा कि यह मेरी जीत नहीं है विधानसभा क्षेत्र के एक-एक कार्यकर्ता की जीत है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ भाजपा पार्टी के मतदाताओं का भी है धन्यवाद करते हैं, क्योंकि अब हमने सुजानपुर का विकास करवाना है सब को एक साथ लेकर आगे बढ़ऩा है। इसलिए मैं सभी का धन्यवाद करता हूं। उन्होंने कहा कि धूमल परिवार हमेशा बदला लेने की बात करता था जो बुरी बात थी।
हम उनके दुश्मन नहीं हैं, जो हम से बदला लेना था राजनीति में और चुनाव मैदान में जब दो योद्धा उतरते हैं, तो एक की जीत और एक की हार होती है दुश्मनी नहीं होती। लेकिन यहां जो बदला लेने की बात होती आई है, उससे दिल को ठेस पहुंची है। राजनीति में ऐसा नहीं होना चाहिए आने वाले समय में सुजानपुर को आगे लेकर जाएंगे सबके सहयोग सबके साथ मिलकर काम करेंगे। (एचडीएम)

कॉलेजियम पर मंत्रियों के बयान से सुप्रीम कोर्ट नाखुश, क्या कहा, जानने के लिए पढ़ें यह खबर

नई दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट में कॉलेजियम सिस्टम को लेकर लगातार सुनवाई जा रही है। गुरुवार को इस मामले में जब सुनवाई हुई, तब कोर्ट केंद्र से खासा नाराज दिखाई दिया। कोर्ट ने दो टूक कहा कि जब तक कॉलेजियम सिस्टम है, तब तक सरकार को भी उसे ही मानना होगा।
सरकार इस बाबत अगर कोई कानून बनाना चाहती है, तो बनाए, लेकिन कोर्ट के पास उनकी न्यायिक समीक्षा का अधिकार है। इस बात पर भी जोर दिया गया है कि सरकार में बैठे मंत्रियों को कॉलेजियम सिस्टम पर बयानबाजी करने से बचना चाहिए।
जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि सरकार कॉलेजियम की सिफारिशों को दो-दो, तीन-तीन बार वापस पुनर्विचार के लिए भेजती है, जबकि सरकार उस पुनर्विचार के पीछे कोई ठोस वजह भी नहीं बताती। इसका सीधा मतलब तो यही है कि सरकार उनको नियुक्त नहीं करना चाहती।
यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले की भावना के खिलाफ है। जस्टिस कौल ने कहा कि केंद्र सरकार ने कॉलेजियम के भेजे नामों में से 19 नाम की फाइल वापस भेज दी है। पिंगपांग का यह बैटल कब सेटल होगा?

गुजरात में भाजपा ने गाढ़े झंडे, 156 सीट जीतकर बनाया नया रिकार्ड, 1985 में 149 पर था कांग्रेस का कब्जा

गुजरात में भाजपा 156 सीटों के साथ जीत का नया रिकॉर्ड बना दिया है। कांग्रेस ने 1985 में माधव सिंह सोलंकी की अगवाई में 149 विधानसभा सीटें जीती थीं। वहीं, मोदी के सीएम रहते भाजपा ने 2002 के चुनाव में 127 सीटें जीती थीं। इस जीत के साथ भाजपा ने दोनों रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
दिलचस्प बात यह है चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि नरेंद्र का रिकॉर्ड भूपेंद्र तोड़ेंगे। गुजरात की 182 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 156 सीटें जीती है। उसे 2017 के मुकाबले 58 सीटों का फायदा हुआ है। वहीं, कांग्रेस को सबसे ज्यादा 60 सीटों का नुकसान हुआ है। पार्टी ने पिछली बार 77 सीटें जीती थीं। इस बार उसे 17 सीटें ही मिली हैं। निर्दलीय और अन्य कैंडीडेट्स ने गुजरात में चार सीटें जीती हैं।
आम आदमी पार्टी गुजरात में महज पांच सीटें जीत सकी है। उसके तीनों बड़े नेता चुनाव हार गए हैं। इनमें मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार इसुदान गढ़वी, प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया और पाटीदार नेता अल्पेश कथीरिया शामिल हैं। इसके बावजूद वोट शेयर के आधार पर आप को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल गया है। अब पार्टी पूरे देश में अपने नाम और चुनाव चिन्ह के साथ लड़ सकेगी।

गुजरात आपका धन्यवाद

गुजरात में भाजपा की विराट जीत के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने गुजरात की जनता को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि गुजरात आपका धन्यवाद। ऐसे नतीजे देखकर मैं अभिभूत हूं।
लोगों ने विकास की राजनीति को अपना आशीर्वाद दिया है और यह भी बता दिया है कि वे और भी इस विकास को और भी तेजी से जारी रखना चाहते हैं। मैं गुजरात की जन-शक्ति के आगे सिर झुकाता हूं।

भाजपा पर फिर दिखाया अटूट भरोसा

गुजरात के सीएम भूपेंद्र पटेल ने कहा कि गुजरात विधानसभा चुनाव का जनादेश अब स्पष्ट हो चुका है, यहां की जनता ने मन बना लिया है कि दो दशक से चली आ रही गुजरात की इस विकास यात्रा को अविरत चालू रखना है। यहां के लोगों ने एक बार फिर भाजपा पर अटूट भरोसा दिखाया है।

ओवैसी के सभी पहलवान चित

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने पहली बार गुजरात विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया था। पार्टी ने कुल 13 में से दो हिंदू कैंडीडेट भी मैदान में उतारे थे। पार्टी के सभी कैंडीडेट चुनाव हार गए हैं।

62 साल के गुजरात में 35 साल कांग्रेस राज

गुजरात में अब तक बनी सरकारों की बात करें, तो 1960 में राज्य बनने के बाद से 1975 तक यहां कांग्रेस की सरकार रही। 1975 में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी, लेकिन अगले ही चुनाव यानी 1980 में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी कर ली।

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