Kargil War Story: सिक्कों ने बचाई थी इस परमवीर चक्र विजेता की जान, ज़ुबानी पढ़कर रोमांच से भर जाएँगे आप

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26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर भारत भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इसी की याद में ’26 जुलाई’ अब हर वर्ष कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है – Kargil vijay diwas

कारगिल वॉर के हीरो योगेंद्र सिंह यादव की जान एक सिक्के ने बचाई। उन्होंने दुश्मनों से लड़ते हुए कारगिल युद्ध में विजय के बाद हिल टॉप पर तिरंगा फहराया था। वक्त गुजरने के साथ यादें धुंधली हो जाती हैं। कारगिल विजय को पूरे 23 साल हो गए। कारगिल की यादें उनके जहन में आज भी जिंदा हैं।

योगेंद्र सिंह यादव सिर्फ 19 साल की उम्र में युद्ध के दौरान सर्वोच्च वीरता सम्मान, परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति हैं. सिर्फ 16 साल की उम्र में वे 1996 में भारतीय सेना के 18 ग्रेनेडिएर्स में भर्ती हुए थे.

उन्होंने बर्फ से ढकी चट्टान पर चढ़ाई शुरू की, आधे रास्ते में ही दुश्मन के एक बंकर ने उन्हें देख लिया और उन पर मशीन गन और रॉकेट से फायरिंग शुरू कर दी थी. तीन गोलियां लगने के बावजूद ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव चढ़ाई करते रहे और पहाड़ी की चोटी पर पहुंच कर रेंगते हुए पाकिस्तानी बंकर तक चले गए. उन्होंने बंकर पर ग्रेनेड फेंका जिससे चार पाकिस्तानी सैनिक मौके पर ही मारे गए. उनकी कोशिशों से प्लाटून के बाकी सदस्यों के लिए चट्टान पर चढ़ने का रास्ता साफ हो गया था.

वही यादें उनका हौसला बढ़ाती हैं और हर मोर्चे पर ताकत देती हैं। वह कहते हैं 20 मई 1999 का दिन मैं कभी नहीं भूल सकता। तब मेरी उम्र मात्र 19 साल और नौकरी ढाई साल की थी। पांच मई को मेरी शादी थी। छुट्टियां लेकर घर आया था। 20 मई को हेडक्वार्टर से बुलावा आ गया। मेरी बटालियन को द्रास सेक्टर के तोलोलिंग पहाड़ी फतह करने का टास्क मिला।

तोलोलिंग पहाड़ी पाकिस्तानी फौज के कब्जे में थी। मेरी पल्टन के जांबाज फौजियों ने 22 दिन की लंबी लड़ाई के बाद तोलोलिंग पहाड़ी पर कारगिल युद्ध की पहली विजय के साथ तिरंगा फहरा था। तोलोलिंग के बाद पलटन का अगला टास्क टाइगर हिल टॉप था।

युद्ध के बाद सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव एक प्रेस कांफ्रेंस में
युद्ध के बाद सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव एक प्रेस कांफ्रेंस में

टाइगर हिल टॉप पूरी तरह पाकिस्तानी फौज के कब्जे में था। वहां पहुंचना आसान नहीं था। जुनून और जज्बे के साथ मेरी पल्टन ने दुश्मनों की तरफ कदम बढ़ाते हुए चढ़ाई शुरू कर दी। पाकिस्तानी फौज पहाड़ी की चोटी पर थी। उसके लिए टारगेट बहुत आसान था।

मैंने और मेरी पल्टन के जवानों ने रास्ता साफ करने के लिए पांच पाकिस्तानी जवानों को ढेर कर दिया। पाकिस्तानी फौज ने ताबड़तोड़ गोलीबारी कर हिंदुस्तानी फौज का रास्ता रोक दिया। पाकिस्तानी फौज की गोलीबारी से बचते हुए मैं अपने सात जांबाज जवानों के साथ टाइगर हिल टॉप पहुंचा। दोनों तरफ से गोलीबारी हुई। हमारे पास बारूद कम था। तब कुछ समझ नहीं आ रहा था। जुनून सिर्फ टाइगर हिल टॉप पर तिरंगा फहराने का था। पाकिस्तानी फौज की आंखों में धूल झोंकने के लिए हमने प्लान के तहत गोलीबारी बंद कर दी। इससे पाक फौज गलतफहमी का शिकार हो गई।

उन्हें लगा कि गोलीबारी में हिंदुस्तानी फौजी मर गए। रणनीति के तहत अचानक पाकिस्तानी फौज पर हमला बोल दिया और कई पाकिस्तानी मारे गए। कुछ पाकिस्तानी फौजी भाग निकले और हमने टाइगर हिल टॉप पर कब्जा कर लिया। जीत का जश्न मना पाते उससे पहले ही 35 मिनट बाद पाक की तरफ  से दोबारा हमला हो गया। पाक फौजियों की संख्या काफी अधिक थी। आमने-सामने की लड़ाई में मेरे सभी साथी मारे गए। मैं भी बुरी तरह जख्मी हो गया। हाथों और पैरों में कई गोलियां लगी थी। लहूलुहान जमीन पर गिरा था। पाक फौजियों ने शहीद हिंदुस्तानी फौजियों के साथ क्रूरता की।

शहीदों के पार्थिव शरीर को बूटों से कुचला और गोलियां बरसाई। जमीन पर पड़ा मैं सब देख रहा था। पाक फौजी वापस होने लगे। एक सैनिक ने जाते-जाते मेरे हाथ और पैरों में गोलियां दागी। उस वक्त दर्द को मैं भूल गया। पाक सैनिक ने एक गोली मेरे सीने में दागी। मेरी जैकेट की जेब में सिक्के थे। सिक्कों ने मेरी जान बचा ली। सीने में गोली लगते ही मुझे एहसास हो गया मैं जिंदा नहीं बचूंगा। भगवान मेरे साथ था। हाथ में गोली लगने से वो सुन्न हो गया था। ऐसा लगा हाथ जिस्म से अलग है। मैंने हाथ उखाड़ने की कोशिश की। लेकिन हाथ जिस्म से अलग नहीं हुआ।

मुझे एहसास हो चुका था मेरी मौत नहीं हो सकती। मैंने दर्द को भुलाकर हिम्मत जुटाई और रैंगते हुए शहीद सैनिकों के पास गया। कोई जिंदा नहीं था। काफी रोया। मेरे पास एक हैंड ग्रेनेड बचा था। उसे खोलकर फेंकने की ताकत नहीं थी। कोशिश की और ग्रेनेड खोलने के साथ फट गया और बाल बाल बचा। फिर अपने साथी की राइफल उठाई और ताबड़तोड़ गोलियां चलाते हुए एक नाले से लुढ़ककर नीचे आ गया। खाने को कुछ नहीं था। ठंड से जिस्म अकड़ गया था। खुद को भरतीय फौज के बेस तक पहुंचाया।

वहां पहुंचने पर पाकिस्तानी फौज की पूरी प्लानिंग की जानकारी दी। 72 घंटे से आधे डिब्बा बिस्कुट पर जिंदा था। तीन दिन के बाद होश आया। तब तक मेरी बटालियन ने टाइगर हिल टॉप पर कब्जा कर तिरंगा फहराने के साथ कारगिल युद्ध में विजय फतह कर ली थी।
–  सूबेदार योगेंद्र सिंह यादव, परमवीर चक्र विजेता

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