जनवरी, 2026 की बर्फबारी ने मनाली को 23 पंगु नहीं बनाया, हिमाचल प्रदेश सरकार ने बनाया। हिमालयी शहर में बर्फबारी कोई असाधारण घटना नहीं, यह मौसमी है, जिसका अनुमान लगाया जा सकता है और जिसकी बार-बार भविष्यवाणी की जाती है। जिस बात ने जनता को चौंका दिया, वह बर्फ की तीव्रता नहीं थी, बल्कि वह गति थी, जिससे शासन व्यवस्था चरमरा गई। इसके बाद जो संकट आया, वह प्रकृति का काम नहीं था, बल्कि दूरदर्शिता, समन्वय और जिम्मेदारी की विफलता थी।

मौसम की चेतावनी काफी पहले से उपलब्ध थी। गणतंत्र दिवस के लंबे वीकेंड ने भारी संख्या में पर्यटकों के आने की गारंटी दी थी। फिर भी कोई स्पष्ट निवारक कार्रवाई नहीं की गई। मनाली में कोई विनियमित प्रवेश नहीं, कोई ट्रैफिक डायवर्जन योजना नहीं, कोई आपातकालीन गलियारा नहीं और बर्फ हटाने वाली पर्याप्त मशीनों की पहले से तैनाती नहीं।
पतलीकूहल-मनाली का 17 किलोमीटर लंबा रास्ता लगभग 3 दिनों तक बंद रहा। हजारों वाहन फंसे रहे। परिवार शून्य से नीचे के तापमान में कारों के अंदर रातें बिताने को मजबूर हुए। बच्चों, शिशुओं और बुजुर्ग नागरिकों को आधिकारिक उपेक्षा का खमियाजा भुगतना पड़ा। स्थानीय लोग अस्पतालों, आवश्यक आपूर्ति और बुनियादी आवाजाही से कट गए।
Think twice before coming to Manali during heavy snowfall.
People stuck in traffic jams for 25+ hours in sub-zero temperatures. pic.twitter.com/jWJNIlnccA
— Go Himachal (@GoHimachal_) January 25, 2026
यह एक अपरिहार्य सवाल उठाता है। जब सीमा सड़क संगठन नियमित रूप से रिकॉर्ड समय में कहीं अधिक खतरनाक ऊंचाई वाले रास्तों को साफ करता है, तो मनाली, जो एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, को पंगु क्यों रहने दिया गया?
इसी तरह परेशान करने वाली बात चयनात्मक प्रवर्तन की व्यापक रिपोर्टें थीं। जबकि निजी वाहनों और पर्यटकों को पतलीकूहल में रोका गया था, टैक्सियां चलती रहीं और कम दूरी के लिए अत्यधिक किराया वसूल रही थीं। आपातकाल के दौरान मुनाफाखोरी के आरोपों को अलग-थलग शिकायतों के रूप में खारिज नहीं किया जा सकता, उन्हें जांच की आवश्यकता है।
जब दूसरों को रोका गया तो टैक्सियों को चलने की अनुमति क्यों दी गई? प्रवर्तन एजेंसियों की चुप्पी और निष्क्रियता केवल संदेह को गहरा करती है और जनता के विश्वास को कम।
अंतर स्पष्ट था। जब आधिकारिक मशीनरी लड़खड़ा रही थी, स्थानीय निवासियों ने भोजन, गर्मी और सहायता के लिए आगे कदम बढ़ाया। दया आम नागरिकों से आई, सरकार से नहीं।
संकट के बाद जारी किए गए सरकारी बयान, ठंडी गाड़ियों में बिताई गई रातों को खत्म नहीं कर सकते या शिशुओं को कड़ाके की ठंड से बचाने की कोशिश कर रहे माता-पिता की परेशानी को मिटा नहीं सकते। शासन को प्रैस नोट से नहीं, बल्कि दबाव में प्रदर्शन से मापा जाता है।
घटना के कई दिन बाद भी जिम्मेदारी तय नहीं की गई। किसी भी अधिकारी का नाम नहीं लिया गया। सड़क साफ करने में देरी के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। यह चुप्पी विफलता का सामना करने की बजाय जनता के गुस्से के शांत होने का इंतजार करने की कोशिश का संकेत देती है।
इस घटना को खराब मौसम कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। यह आपदा की तैयारी, ट्रैफिक मैनेजमैंट और लागू करने की ईमानदारी में सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करता है। यह प्राथमिकताओं और जवाबदेही के बारे में परेशान करने वाले सवाल भी उठाता है।
एक मौजूदा हाई कोर्ट जज की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र न्यायिक जांच होनी चाहिए। ऐसी जांच में तैयारी में विफलता, बर्फ हटाने में देरी, लागू करने में चूक और मिलीभगत के आरोपों की जांच होनी चाहिए। व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। संस्थागत भूलने की बीमारी को हावी नहीं होने दिया जा सकता।
हिमाचल प्रदेश के लोग ऐसे शासन के हकदार हैं जो पहली भारी बर्फबारी के साथ ही ढह न जाए। जवाबदेही कोई रियायत नहीं, हर नागरिक का न्यूनतम अधिकार है। बर्फ ने मनाली की सड़कों को उजागर किया। इस संकट ने सरकार को उजागर किया।
अगर इस विफलता को बिना किसी प्रणाम के जाने दिया गया, तो यह फिर होगा, ज्यादा कीमत और शायद अपरिवर्तनीय नुकसान के साथ। न्याय, पारदर्शिता और सुधार वैकल्पिक नहीं, वे जरूरी हैं।
||वैष्णव गांधी||



























