शिमला।। जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं तो संभव है आप मलाणा के बारे में काफी कुछ पढ़ चुके होंगे। यदि आप हिमाचली हैं तो एक हिमाचली होने के नाते आप मलाणा के बारे में गर्व भी महसूस करते होंगे और दूसरे व्यक्ति को इसके बारे में सुनी-सुनाई बाते बड़े चाव से बताते भी होंगे।
मसलन, “मलाणा सबसे पुराना लोकतंत्र है”। “मलाणा में देवता का राज चलता है”, मलाणा हिमाचली संस्कृति की शान है” आदि आदि।
लेकिन मलाणा की सच्चाई क्या है इसके बारे में हमने गहन रिसर्च की है और इसके बारे में बहुत सारे लोगों से जोकि मलाणा का भ्रमण कर चुके थे, से सीधे बात भी की। हमारी जानकारी में मलाणा के बारे में जो तथ्य सामने आये वे काफी चौंकाने वाले थे।
आपने अस्पृश्यता यानि छुआछूत के बारे में पढ़ा व सुना है, ठीक हैं? एक हिन्दोस्तानी या हिमाचली होने के नाते आपके आस पड़ोस में अवश्य ही आपने इसे देखा होगा। लेकिन मलाणा छुआछूत के मामले में कुछ ज्यादा ही गंभीर है। इसके संभव कारणों पर हम बाद में चर्चा करेंगे। अभी देखें कि छुआछूत का मामला क्या है।
यहाँ पर एक अजीब सा कायदा है। अगर कोई गाँव में चलते हुए किसी घर को या किसी सामान को गलती से छू लेता है तो उसे 1500 से 5000 रुपये का जुर्माना भरना पड़ता है। और तुर्रा ये कि आपको चलते हुए मॉनिटर करने के लिए हर घर के आगे कोई न कोई मौजूद मिलता है।
ऐसा इसलिए क्योंकि मलाणा के निवासी अपने आप को महान और पवित्र समझते हैं और बाहरी लोगों को अपवित्र। जैसे ही आप से गलती हुई, आपको आपके “तुच्छ” होने का जुर्माना भरना पड़ेगा। गाँव के बीचोंबीच बने कुछ खाली जगह में तो बैठना भी मना है।
ऐसे लोग जो लगभग अनपढ़ हैं और ऐसे परिवेश में रहते हैं जहाँ नहाना और साफ-सफाई कभी-कभार ही होते हैं, फिर भी ये लोग आप से यहाँ घूमने आने का और खुद के श्रेष्ठ होते का हर्जाना वसूलने के लिए सदा तत्पर रहते हैं।
इस व्यवहार का दूसरा संभव कारण यह है कि मलाणा निवासी बाहरी लोगों को इसलिए घुलना-मिलना पसंद नहीं करते क्योंकि उन्हें डर है अपनी सभ्यता और संस्कृति को न खो दें। लेकिन हिमाचल के हर ऊपरी क्षेत्र में हिमाचली संस्कृति इतनी समृद्ध है कि उसे अपने खोए जाने का डर होने का सवाल ही नहीं। अगर डर है भी तो केवल मलाणा के निवासियों में ही, और यह इतना ज़्यादा है कि एक फोबिया सा लगता है?
तीसरा और असली महत्वपूर्ण कारण हो सकता है, और शायद है भी, और वह है मलाणा क्रीम। क्योंकि मलाणा के लोग बाहरी लोगों को घर तक को छूने की इजाजत नहीं देते घर के अन्दर जाना बहुत दूर की बात है। क्योंकि पुलिस या प्रशासन का कोई भी व्यक्ति घरों के अन्दर नहीं जा सकता इसलिए मलाणा क्रीम का व्यापार बिना-किसी रोक टोक के लगातार जारी रहता है।
मलाणा के बारे में एक भ्रान्ति है कि यह दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है। इस विचार की पुष्टि करने के लिए लोग तर्क देते हैं कि मलाणा में जमलू देवता (जमदग्नि ऋषि) के कहे अनुसार सारे कर्मकांड होते हैं। देवता लगभग सभी मामलों, चाहे वे पारिवारिक हों या सामाजिक, में अपना दखल और फैसला देते हैं।
लेकिन यह तथ्य भी पूरी तरह से सच नहीं हैं क्योंकि हिमाचल प्रदेश के लगभग सभी भागों, विशेषकर उपरी क्षेत्रों में लोग देवी-देवताओं को बहुत अधिक सम्मान देते हैं और उनके मार्ग-दर्शन में अपना काम-काज चलते हैं। लोगों के दैनिक, पारिवारिक व सामजिक जीवन में देवी-देवता उतना ही रोल निभाते हैं जितना कि मलाणा जैसे किसी अन्य गाँव में निभाते हैं। यह परम्परा कई सदियों से चली आ रही है इसलिए यह कहना कि ऐसा केवल मलाणा में ही संभव है, यह कहना अन्य हिमालयी क्षेत्रों के देवी-देवताओं और निवासियों के साथ ज्यादती ही होगा।
अब प्रश्न उठता है कि मलाणा के इस तथाकथित लोकतंत्र को ही इतनी प्रसिद्धी क्यों मिली जबकि बाकी क्षेत्रों की समान व्यवस्था को नहीं। इसका सीधा सा कारण यह है कि यहाँ लम्बे समय से देश-विदेश से सैलानी आ रहे हैं जिनमें से अधिकतर चरस की खोज में ही आते हैं। मलाणा के लोग इन नशेड़ी लोगों का उपयोग अपने प्रचार-प्रसार के लिए सफलतापूर्वक करते रहे हैं ताकि यहाँ ज्यादा-से-ज्यादा पर्यटक आयें और इन लोगों को बैठे-बिठाए कमाई होती रहे।
मलाणा की मुख्य समस्या यहाँ पर की जाने वाली चरस की खेती है। जग-जाहिर तथ्य है कि कसोल में रहने वाले इजरायली लोगों ने इस गाँव के चरस व्यवसाय पर एकाधिकार कर रखा है जिसकी वजह से ये बाहर के लोगों को इस इलाके में नहीं आने देना चाहते। इसलिए बड़ी रकम के लालच में इन लोगों ने इतने कठोर कायदे-क़ानून बना रखे हैं ताकि इनके ग्राहकों के अलावा अन्य लोग इनके गाँव में आने से कतराएँ। यहां की चरस अच्छी गुणवत्ता वाली मानी जाती है, इसलिये ज्यादा महंगी है।
क्यों डरते हैं पुलिस और प्रशासन
हिमाचली शुरू से ही धर्म-भीरु और काफी हद तक अन्धविश्वासी रहे हैं। हो सकता है यह आपके मामले में सच न हो लेकिन यह एक सच्चाई है कि आज भी एक-पढ़ा-लिखा पोस्ट ग्रेजुएट भी “ग्रह-दशा” और “उपाय-टोटके” की बाते करता हुआ आसानी मिल जाता है। इसी मनोदशा के चलते ये लोग किसी की बात को आसानी से मानने वाले होते है. ख़ास-कर जब ये बातें देवी-देवता और धर्म से रिलेटेड हो। जाहिर है कि प्रशासन में बैठे लोग भी इसी भय के कारण सरेआम छुआछूत और चरस के व्यापार के खिलाफ कठोर कदम उठाने से हिचकते हैं।
डबल स्टैण्डर्ड
मलाणा गाँव में एक और जहाँ हर घर के बाहर “छूने से बचने की” चेतावनी और जुर्माने की रकम की जानकारी लिखी मिलती है वहीँ दूसरी और यहाँ के बाशिंदे हर आने जाने वाले को कुख्यात “मलाणा क्रीम” चरस का खरीदने का ऑफर देना नहीं भूलते। हो भी क्यों नहीं, इन लोगों को यहीं बैठे-2 लाखों की आमदनी हर साल जो हो जाती है।
अतिथि देवो भव के बजाये नशेडी देवो भव:
भारत के किसी भी कोने में अतिथि देवो भव: का मंत्र सुनने को मिल सकता है लेकिन मलाणा में “नशेड़ी’ देवो भव:” और “अतिथि अछूत भव:” ही चलता है. यहाँ के लोग आपको हिमाचल प्रदेश के भोले-भले ग्रामीण कम और ठग कर, डरा कर और तस्करी करके कमाने वाले पैंतरेबाज़ ज्यादा लगते हैं।
हों भी क्यों नहीं? यहाँ के बाशिंदे खुद मानते हैं कि वे सिकंदर या यूरोप के किसी दूसरे आक्रान्ता के वंशज हैं और ये लोग हिमाचली, तिब्बती, पहाड़ी बोली से बाहर की कोई अलग ही बोली बोलते हैं जो किसी अन्य की समझ में नहीं आती।
सरकार के प्रयास बेकार
सरकार ने इन लोगों के लिए गेहूं, मक्की आदि फसलों के बीज फ्री में मुहैय्या करवाने का एलान कर रखा है। बावजूद इसके यहाँ के निवासी इन फसलों को उगाने में कुछ भी दिलचस्पी नहीं रखते। भला कौन चरस की लाखों की कमाई छोड़ कर मामूली अन्न की फसलों को उगायेगा। चरस की खेती ही यहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है और रोजगार का एक मात्र साधन है।
(यहाँ नीचे दिए गये वीडियो में आप मलाणा के एक निवासी की रोजगार की “व्यथा” सुन सकते हैं.)
सरकार और प्रशासन के भांग की खेती को हतोत्साहित करने के प्रयास भी बेकार सिद्ध हो रहे हैं. इसका सीधा सा कारण है की केवल मलाणा में ही इतने बड़े पैमाने पर भांग की खेती की जाती है कि गाँव की सारी खेती को नष्ट करना नामुमकिन ही है. दूसरे जब से इस तरह के अभियान चलाये गये हैं मलाणा निवासी गाँव से कई कई किलोमीटर दूर ऊपर जंगलों में खेती करने लगे हैं. इन खेतों तक जाने के लिए 10-12 घंटों की ट्रैकिंग करनी पड़ती है इसलिए पुलिस के कुछ-एक लोगों के लिए वहां जाकर खेती को नष्ट करना नामुमकिन है.
चरस की खेती को ख़त्म करने में अन्य समस्या यह है यहाँ के लोगों का रोजगार और उनका पुनर्वास. मलाणा शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और सामाजिक व्यवहार जैसी मूलभूत सेवाओं से पूर्णतया वंचित है. यहाँ के सभी लोग जिनमें 3-4 साल के बच्चे भी शामिल हैं, चरस के उत्पादन में शामिल हैं और उनके पास करने को दूसरा काम नहीं है. एक ठोस नीति के अभाव में सरकारें कुछ भी करने में असमर्थ हैं.
(मलाना की इस काली सच्चाई को सामने लाने के लिए WION ने एक बहुत ही अच्छा वीडियो YouTube पर अपलोड किया है जिसे आप यहाँ नीचे भी देख सकते हैं)
क्या सोचते हैं पर्यटक
पर्यटक विशाल के अनुसार, “इनमें (मलाणा के लोगों में) हिमालयी तहजीब बिल्कुल भी नहीं है। हिमाचल के कुल्लू जिले के इस दुर्गम गांव में मेहमान नवाजी नाम की कोई प्रथा दूर-दूर तक नहीं है। ग्रामीणों की निगाह केवल आपकी हरकतों पर रहेंगी और मामूली सी लापरवाही आपकी जेब पर भारी पड जायेगी।”
(इस पोस्ट के माध्यम से हमने वही जानकारी लोगों के सामने रखी है जो हमने पिछले कुछ समय से एकत्रित की थी. यदि इससे किसी की भावनाएं आहत हुई हों तो हमें खेद है)


























