आ गई औषधीय गुणों से भरपूर कचनार, वैद्य-हकीम छाल, पत्तों-फूलों से करते थे कई रोगों का उपचार

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आधुनिकरण व भागदौड़ भरे व्यस्ततम जीवन में किसी भी व्यक्ति के पास कुदरती तौर पर सदियों से उपलब्ध होने वाली विभिन्न प्रकार की औषधियों व पदार्थों को हासिल करते हुए प्रयोग करने का समय नहीं है, लेकिन कुदरत द्वारा साल भर विशेष मौसमों में इंसान के प्रयोग हेतु समय समय पर कई प्रकार के पदार्थों को घर आंगन पर प्रयोग हेतु उपलब्ध करवा रहा है। इन दिनों कुछ ऐसी ही औषधीय गुणों से भरपूर कचनार (कराले) की कलियां लोगों के लिए कुदरती वरदान के रूप में निशुल्क उपलब्ध है।

वैद्य व हकीम करते थे उपचार

पौराणिक समय में वैद्य व हकीम कचनार पेड़ की छाल, पत्तों और फूलों से विभिन्न मरीजों का उपचार करते थे। इन दिनों हर जगह कचनार (कराले) के पेड़ों पर फूल खिलने से वादियां गुलजार हो उठी हैं। कराले के पेड़ पर सफेद, गुलाबी और बैंगनी रंग में फूल खिलते हैं। बुजुर्ग लोग जो इस गुणों से भरपूर औषधीय कराले के बारे में जानते है, वे इन दिनों कराले के पेड़ से जमकर कलियों को तोडक़र विशेष रूप से एक ओर लाजवाब स्वादयुक्त सब्जी का आनंद उठा रहे है।

औषधीय गुण

दूसरी ओर कराले की कलियों के अंदर मौजूद कई प्रकार के औषधीय गुणों को सेवन करते हुए स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रहे हंै। कचनार (कराले) के पेड़ पर कलियां हर वर्ष बसंत के मौसम के शुरू होने के साथ लगती है व रंग बिरंगे फूल के रूप में खिलने के बाद नष्ट हो जाती हैं। मात्र दो महीनों तक कलियों व फूलों के खिलने का क्रम रहता है, जिसके बाद पेड़ पर अगले बसंत में ही कलियां लगती है।

ऐसे बनती है कचनार की सब्जी

कचनार की सब्जी बनाने हेतु सबसे पहले बड़े पेड़ पर चढ़ते हुए कचनार की कलियों को उतारना पड़ता है, जो बड़े ही खतरे व मेहनत का काम है, जिसके बाद उतारी गई कलियों को छांट करते हुए टहनियां व अन्य पत्तों को अलग किया जाता है।

कलियों को उबालें

अलग करने के बाद कलियों को अच्छी तरह से पानी से धोते हुए साफ किया जाता है, जिसके बाद इसे पानी में तब तक उबाला जाता है जबतक कालिया पककर नरम नहीं हो जाती है। कलियां पकने के बाद इन्हें हाथ से निचोड़कर अतिरिक्त पानी निकालते हुए अलग किया जाता है।

फिर आमतौर पर सब्जी बनाने की विधि का प्रयोग करते हुए इसे अच्छी तरह टमाटर का प्रयोग करते हुए बनाया जाता है। कई लोग इसका दही का रायता भी बनाते हैं।

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