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आईआईटी मंडी में जल्द शुरू होगा जलवायु परिवर्तन और भूकंप पर शोध : प्रो. लक्ष्मीधर

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के 14वें दीक्षांत समारोह के समापन के बाद संस्थान के निदेशक प्रो. लक्ष्मीधर बेहरा ने भविष्य की बड़ी योजनाओं का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि आईआईटी मंडी जल्द ही पर्यावरण और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में देश को नई दिशा देने के लिए जलवायु परिवर्तन और भूकंप पर बड़े पैमाने पर शोध शुरू किया जाएगा।

भूकंप अनुसंधान के लिए बनेगा थ्री-डी पेंडुलम

निदेशक प्रो. बेहरा ने कहा कि पहाड़ी राज्यों में भूकंप और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। इस चुनौती से निपटने के लिए संस्थान में एक अत्याधुनिक थ्री-डी पेंडुलम का निर्माण किया जा रहा है। इस पेंडुलम के माध्यम से भूकंप की गतिशीलता और उसके प्रभावों पर गहन वैज्ञानिक शोध किया जाएगा, जिससे भविष्य में आपदा के नुक्सान को कम करने में मदद मिलेगी।

सुरक्षा बलों के सहयोग से आम जनता को दी जाएगी आपदा प्रबंधन की ट्रेनिंग

संस्थान केवल प्रयोगशालाओं तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अनुसंधान का लाभ सीधे समाज तक पहुंचाएगा। प्रो. बेहरा ने बताया कि आईआईटी मंडी पुलिस विभाग और अन्य सुरक्षा कर्मियों के साथ मिलकर एक विशेष अभियान चलाएगा। इसके तहत स्थानीय लोगों और हितधारकों को आपदा के दौरान त्वरित बचाव और राहत कार्यों के व्यावहारिक तरीके सिखाए जाएंगे, ताकि संकट के समय कीमती जान-माल की रक्षा की जा सके।

क्वांटम टैक्नोलाॅजी के लिए केंद्र से मिले 200 करोड़ रुपए

आईआईटी मंडी तकनीकी क्षेत्र में भी एक नया मील का पत्थर स्थापित करने की ओर अग्रसर है। प्रो. बेहरा ने बताया कि केंद्र सरकार ने संस्थान को क्वांटम टैक्नोलाॅजी को विकसित करने के लिए 200 करोड़ रुपए की भारी-भरकम धनराशि स्वीकृत की है। इस बजट से संस्थान में विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च लैब तैयार की जा रही हैं।

सस्ते सुपर कम्प्यूटर के निर्माण पर फोकस

वर्तमान में सुपर कम्प्यूटर के निर्माण और रखरखाव पर आने वाली अत्यधिक लागत को एक बड़ी चुनौती मानते हुए आईआईटी मंडी के वैज्ञानिक अब इसके किफायती विकल्प पर काम कर रहे हैं। आईआईटी निदेशक ने कहा कि मौजूदा समय में सुपर कम्प्यूटर को बनाने में बहुत अधिक खर्च आता है।

हमारा संस्थान इस दिशा में तेजी से कार्य कर रहा है कि कैसे इस तकनीक को कम से कम कीमत पर तैयार किया जा सके, ताकि इसका लाभ अधिक से अधिक शोधकर्त्ताओं और संस्थानों को मिल सके।

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