हिमाचल में इन दिनों झमाझम बारिश हो रही है, कई जगह भूस्खलन हो रहे हैं, रास्ते बंद हो रहे हैं और फिर मलबा हटाकर इन्हें दोबारा खोल भी दिया जा रहा है, लेकिन इन सब के बीच क्या आप जानते हैं हिमाचल में एक पहाड़ी, एक सड़क ऐसी है जहां बार बार मलबा आ रहा है।
और ये मलबा अपने साथ आने वाली बड़ी तबाही का अल्टीमेटम भी दे रहा है। ये हैं मंडी पठानकोट नेशनल हाईवे 154 पर पधर उपमंडल के तहत कोटरोपी पहाडी।
आपको साल 2017 की 13 अगस्त की वो रात तो याद होगी जब हिमाचल की कोटरोपी की पहाड़ी ने देखते ही देखते 46 लोगों को हमेशा के लिए अपने आगोश में ले लिया था।
जब यहां भयंकर भूस्खलन ने बस को अपनी चपेट में ले लिया था, और हर तरफ बस मातम पसर गया था। हिमाचल आज भी उस हादसे को भूल नहीं पाया है और अब सालों बाद उसी पहाड़ को लेकर एक बार फिर डराने वाली चेतावनी सामने आई है।
एक ऐसी रिपोर्ट जो आम नहीं है, बल्कि मंडी आईआईटी की ताजा वैज्ञानिक स्टडी है। जिसमें साफ साफ ये बताया गया है कि सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मंडी पठानकोट नेशनल हाईवे 154 पर पधर उपमंडल के तहत आने वाली कोटरोपी की पहाड़ी लगातार धंस रही है।
यकीनन आपमे से बहुत से लोग कई बार यहां से गुजरें होंगे। आपने इस पहाड़ी की अस्थिर हालत को भी जरूर नोटिस किया होगा। अब कहा जा रहा है कि ये पहाड़ फिर फटने को तैयार है, इसका दाहिना हिस्सा बेहद अस्थिर हो चुका है और यहां किसी भी समय बड़ा भू-स्खलन हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह पहाड़ फिर से कहर बरपा सकता है…यहां तक कि फैक्टर ऑफ सेफ्टी यानि सुरक्षा गुणांक ने खतरे की घंटी बजा दी है।
प्रतिष्ठित जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स नेचर पोर्टफोलियो में 27 जून को एक शोध प्रकाशित हुआ था, जिसके अनुसार कोटरोपी भू-स्खलन क्षेत्र की दाहिनी ढलान का फैक्टर ऑफ सेफ्टी केवल 0.35 से 0.5 के बीच पाया गया है।
जबकि भू-वैज्ञानिक मानकों के अनुसार किसी ढलान का सुरक्षा गुणांक (Factor of Safety) एक से कम होना उसके अस्थिर होने का संकेत माना जाता है। ऐसे में 0.35 से 0.5 का स्तर बेहद चिंताजनक है और यह इस ओर इशारा कर रहा है कि पहाड़ी का यह हिस्सा किसी भी समय ढह सकता है।
शोध में सबसे चिंताजनक तथ्य यह भी सामने आया कि अध्ययन के लिए चुने गए सभी सात प्रोफाइल्स का सुरक्षा गुणांक एक से नीचे दर्ज किया गया। इसका मतलब है कि केवल पहाड़ का एक हिस्सा ही नहीं, बल्कि पूरी ढलान भीतर से कमजोर हो चुकी है और लगातार खतरे की स्थिति में है।
अब सवाल ये हैं कि आखिर ये पहाड़ी क्यों इतना धंस रही है। कैसे इतनी कमजोर हो गई है। तो इसका जवाब भी वैज्ञानिकों ने दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार कोटरोपी क्षेत्र में बार-बार होने वाले भू-स्खलन के पीछे कई प्राकृतिक और भू-वैज्ञानिक कारण जिम्मेदार हैं।
इनमें मेन बाउंड्री थ्रस्ट (Main Boundary Thrust) की मौजूदगी, लगातार टेक्टोनिक गतिविधियां, चट्टानों की प्रतिकूल दिशा, गहरी दरारें और जोड़ों का जाल प्रमुख हैं। ऐसे में भारी बारिश के दौरान पानी इन दरारों में समा जाता है।
जिससे चट्टानों और मिट्टी की पकड़ कमजोर पड़ जाती है और ढलान के खिसकने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसा नहीं है कि यहां खतरे को कम नहीं किया जा सकता है। दरअसल जिस शोध में इस खतरे को उजागर किया गया है, उसी में समाधान का जिक्र भी है।
दरकते कोटरोपी पहाड़ पर स्टडी करने वालों में मंडी आईआईटी के प्रोफेसर नितेश धीमान, अंकित सिंह और डेरिक्स प्रेज शुक्ला शामिल हैं। यह तीनों ही आईआईटी मंडी सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग स्कूल में शोध कर रहे हैं। इसमें नेपाल त्रिभुवन विश्वविद्यालय के नीरज केसी और हेल्महोल्ट्ज सेंटर जर्मनी के प्रोफेसर शरद कुमार गुप्ता शामिल रहे हैं।
इन्होनें कोटरोपी की ढलान का अध्ययन अत्याधुनिक तकनीकों की मदद से किया। इसके लिए ड्रोन (यूएवी) आधारित हाई-रिजॉल्यूशन मैपिंग, जर्मन टैनडेम-एक्स सैटेलाइट इमेजरी, मैदानी सर्वेक्षण और कम्प्यूटर सिमुलेशन का इस्तेमाल किया गया।
साथ ही लिमिट इक्वि लिब्रियम मेथड और फिनाइट एलिमेंट मॉडल के जरिए ढलान की स्थिरता का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया। अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता एवं आईआईटी मंडी के एसोसिएट प्रोफेसर डेरिक्स प्रेज शुक्ला का कहना है कि अगर समय रहते वैज्ञानिक उपाय अपनाए जाएं तो भविष्य में जान-माल के बड़े नुकसान को रोका जा सकता है।
इसके लिए संवेदनशील ढलानों पर सुरक्षात्मक दीवारों का निर्माण, बेहतर ड्रेनेज सिस्टम, वर्षा जल की उचित निकासी और ढलान को स्थिर करने के अन्य इंजीनियरिंग उपाय तत्काल लागू किए जाने चाहिए.. ताकि 2017 जैसी त्रासदी दोबारा न दोहराई जाए।
